विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 343, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ें३३२ विनय-पत्रिका
मानुष जन्म महा अति दुर्लभ, तुम समझो अभिमानी।
लोभ नदीकी लहर बहुतु है, बूड़ोगे बिनु पानी ॥
जोगी जैहैं जंगम जैहैं औ जैहैं बड़ ज्ञानी।
कहै कबीर एक सन्त न जैहैं जाको चित ठहरानी ॥
[ १९९ ]
काहे को फिरत मूढ़ मन धायो ।
तजि हरि-चरन-सरोज सुधारस, रविकर-जल लय लायो ॥१॥
त्रिजग देव नर असुर अपर जग जोनि सकल भ्रमि आयो ।
गृह, बनिता, सुत, बंधु भये बहु, मातु पिता जिन्ह जायो ॥२॥
जाते निरय-निकाय निरंतर, सोइ इन्ह तोहि सिखायो ।
तुव हित होइ, कटै भव-बंधन, सो मग तोहि न बतायो ॥३॥
अजहुँ बिषय कहँ जतन करत, जद्यपि बहु विधि डहँकायो ।
पावक-काम भोग-घृत तें सठ, कैसे परत बुझायो ॥४॥
बिषय हीन दुख, मिले बिपति अति सुख सपनेहुँ नहिं पायो ।
उभय प्रकार प्रेत-पावक ज्यों धन दुखप्रद श्रुति गायो ॥५॥
छिन-छिन छीन होत जीवन, दुर्लभ तनु वृथा गँवायो ।
तुलसिदास हरि भजहि आस तजि, काल-उरग जग खायो ॥६॥
शब्दार्थ—त्रिजग = तिर्यक् (पशुपक्षी) । निरय = नरक । निकाय = समूह । डहँकायो
= ठगा गया । प्रेत-पावक = प्रेतकी आग ।
भावार्थ—रे मूढ़ मन ! तू किसलिए दौड़ता फिर रहा है ? भगवच्चरणा-
रविन्दके सुधारसको छोड़कर तूने मृगतृष्णाके जलमें लगन लगा रखी है ॥१॥
पशु, पक्षी, देवता, मनुष्य, राक्षस एवं संसारमें और जितनी योनियाँ हैं, सबमें तू
घूम आया । बहुतसे घर, स्त्री, पुत्र, भाई तथा तुझे उत्पन्न करनेवाले माता-
पिता हुए ॥२॥ किन्तु इन सबने तुझे वही सिखाया जिससे तेरे लिए नरक-समूह
निरन्तर बना रहे (तुझे नरकोंमें ही रहना पड़े); ऐसा मार्ग इन सबने तुझे नहीं
बताया जिससे तेरा हित हो, और संसार-बन्धन कट जाय ॥३॥ यद्यपि तू अनेक
तरहसे ठगा गया, फिर भी तू अभीतक विषयोंके ही लिए यत्न कर रहा