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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 341

३३० विनय-पत्रिका
सुनिय नाना पुरान, मिटत नाहिं अग्यान,
पढ़िय न समुझिय जिमि खग कीर ।
बझत बिनहिं पास सेमर-सुमन-आस,
करत चरत तेइ फल बिनु हीर ॥२॥
कछु न साधन-सिधि, जानौं न निगम-विधि,
नहिं जप-तप बस मन न समीर।
तुलसिदास भरोस परम करुना-कोस,
प्रभु हरिहैं विषम भवभीर ॥३॥
शब्दार्थ — उछंग = गोद। कीर = तोता। पास = पाश, जाल। चरत = चोंच मारता
है, चरता है। हीर = गूदा।
भावार्थ—श्रीरामजीके चरणोंमें मेरी प्रीति नहीं है, इसीसे दुःख सह रहा
यह बात वेदों और धीर बुद्धिवाले समस्त मुनियोंने कही है। क्योंकि जो
चन्द्रमाकी गोदमें रहकर अमृतका स्वाद लेता है, उसे मृगजलमें क्यों
होने लगा ? (तात्पर्य यह कि जैसे जंगली हरिणको मृगजलका भ्रम होत
पर जो हरिण चन्द्रमाका वाहन है और अमृतपान करता है, वह मृगतृ
नहीं भूल सकता, उसी प्रकार ईश्वरसे विमुख प्राणियोंको संसारकी सत्त
विश्वास होनेके कारण अनेक दुःख झेलने पड़ते हैं; पर हरिभक्तोंको उसका
नहीं होता, क्योंकि वे जानते हैं कि यह संसार मिथ्या है) ॥१॥ जैसे
पक्षी पढ़ता तो है, पर समझता कुछ नहीं, उसी प्रकार अनेक पुराणोंके
रहनेपर भी मेरा अज्ञान दूर नहीं होता। मूर्ख तोता सेमरके फूलकी आ
करता है और बिना गूदेके उस फलमें चोंच मारता है; इस भाँति वह
जालके ही फँस जाता है (वैसे ही मनुष्य निस्तत्त्व सांसारिक विषयोंमें आस
होकर अपने अज्ञानसे बँध जाता है) ॥२॥ न तो मुझमें कोई साधन है
न सिद्धि ही; वैदिक विधियोंको भी मैं नहीं जानता। न मैंने जप, तप एवं म
वशमें किया है, और न प्राण-वायुपर ही अधिकार जमाया है। इस तुल
दासको तो बहुत बड़ा भरोसा है कि करुणाके भण्डार श्रीरामजी इसकी घ
सांसारिक वेदना हर लेंगे ॥३॥