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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 254

विनय-पत्रिका २४३
अन्तःकरण, बुद्धि अथवा अज्ञानमें पड़ता है, उसके कारण ईश्वर और जीवके
रूप कई तरहके माने गये हैं। आभास मिथ्या होता है, अतः ईश्वर और
जीवके रूप भी मिथ्या हैं। इस मतके अनुसार ईश्वर और जीवके रूप ये हैं—
शुद्ध चेतन और मायामें शुद्ध चेतनका आभास ईश्वर है। अविद्या, अविद्याका
अधिष्ठान कूटस्थ, और कूटस्थका अविद्यामें आभास जीव है। बुद्धि-वासना-
विशिष्ट अज्ञानमें शुद्ध चेतनका आभास ईश्वर है। अन्तःकरण, अन्तःकरणका
अधिष्ठान कूटस्थ, और कूटस्थका अन्तःकरणमें आभास जीव है। शुद्ध चेतन
और मायामें शुद्ध चेतनका आभास ईश्वर है। बुद्धि, बुद्धिका अधिष्ठान कूटस्थ
और कूटस्थका बुद्धिमें आभास जीव है। अथवा बुद्धिका अधिष्ठान कूटस्थ, और
बुद्धिमें ब्रह्मका आभास जीव है। अथवा अज्ञानका अधिष्ठान कूटस्थ और
कूटस्थका अज्ञानमें आभास जीव है। समष्टि बुद्धि वासना-विशिष्ट अज्ञानमें
चेतनका आभास ईश्वर है। अन्तःकरणमें चेतनका आभास जीव है।
प्रतिबिम्बवाद—दर्पणमें जो मुखका प्रतिबिम्ब दिखाई देता है, वह
मुखका प्रतिबिम्ब है। प्रतिबिम्ब तो मिथ्या नहीं है, पर बिम्ब मुखमें ही प्रति-
बिम्बकी प्रतीति भ्रमरूप है। तात्पर्य यह कि बिम्ब और प्रतिबिम्ब एक ही हैं।
इसी प्रकार माया और अविद्यामें जो ब्रह्मका प्रतिबिम्ब दिखता है, वह और ब्रह्म
एक ही हैं। प्रतिबिम्बवादके कई भेद हैं। १—शुद्ध चेतनके आश्रित मूल-
प्रकृतिमें चेतनका प्रतिबिम्ब ईश्वर है। अविद्या-रूप अनेक अंशोंमें चेतनके अनेक
अनन्त प्रतिबिम्ब जीव हैं, और आवरण-शक्ति विशिष्ट मूल-प्रकृतिके अंशोंको
अविद्या कहते हैं। २—मायामें चेतनका प्रतिबिम्ब ईश्वर, और अविद्यामें चेतनका
प्रतिबिम्ब जीव है। यहाँपर यह उल्लेख करना आवश्यक है कि मूलप्रकृतिके
दो रूप हैं—माया और अविद्या। शुद्ध सत्त्व-प्रधान माया है, जिसमें विक्षेप-
शक्तिकी प्रधानता है और मलिन-सत्त्व-प्रधान अविद्या है जिसमें आवरण-
शक्तिकी प्रधानता है। ईश्वर सर्वज्ञ है और जीव अल्पज्ञ। ३—अविद्यामें
चेतनका प्रतिबिम्ब .ईश्वर है, और अन्तःकरणमें चेतनका प्रतिबिम्ब जीव है।
(यहाँ अविद्याका अर्थ अज्ञान है) ४—अज्ञानोपहत बिम्ब ईश्वर है, और
अज्ञानमें प्रतिबिम्ब जीव है।
एकजीव-वाद—अद्वैत-मतमें आत्मा एक है, और जीव अनेक। जीवोंका