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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 255

२४४ विनय-पत्रिका
ही आवागमन होता है । इन्हींको पिछले कर्मोंका फल भोगना पड़ता है । कुछ
वेदान्तियोंके मतमें आत्मा और जीव दोनों ही एक हैं । अन्य जीव, जीवाभास
अर्थात् भ्रम-मात्र हैं । इस पक्षका कथन है कि ब्रह्म ही अपनी अविद्यासे जीव
हो गया है । वही ईश्वरकी कल्पना कर लेता है । न तो जीव अवच्छेदरूप है
और न आभास या प्रतिबिम्बरूप ही । ब्रह्ममें जो कल्पित अज्ञानसे जीवभाव
उत्पन्न हुआ है, वह ठीक वैसे ही है, जैसे कुन्तीका पुत्र कर्ण अज्ञानके कारण
अपनेको दासी-पुत्र समझता था । ब्रह्मने ही अज्ञानसे जीव बनकर ईश्वरको
भी उत्पन्न कर लिया है । या यों भी कहा जा सकता है कि शुद्ध चेतन ब्रह्म
अपने आश्रित अज्ञानकी उपाधिके कारण जीवरूप हुआ है । इसी एक जीवने
अपने विषयमें नाना जीवों, ईश्वर और जगत् प्रपंचकी कल्पना कर ली है । इस
मतमें भी निम्नलिखित भेद हैं:—
क—जीव एक है, अनेक नहीं । सजीव शरीर एक ही है । जो अन्य शरीर
दिखाई देते हैं; वे स्वप्नके शरीरोंके समान निर्जीव हैं ।
ख—ब्रह्म जीव नहीं है, ब्रह्मका प्रतिबिम्ब-रूप हिरण्यगर्भ एक मुख्य जीव
है । बिम्ब ब्रह्म उससे भिन्न है । इसी हिरण्यगर्भने जगत्की रचना की है ।
हिरण्यगर्भका शरीर इस मुख्य जीवसे सजीव है और दूसरे शरीर जीवाभास-
रूप जीवोंसे सजीव हैं ।
ग—अविद्यामें ब्रह्मका प्रतिबिम्ब ही जीव है और अविद्याके एक होनेसे
वह एक है । वह जीव भोगके लिए सब शरीरोंको आश्रय देता है । उसी जीव-
के प्रतिबिम्ब अन्य सब जीव हैं । इन प्रतिबिम्बाभास-रूप जीवोंसे अन्य सब
शरीर सजीव हैं ।
नानाजीव-वाद—इस मतमें भी कई भेद हैं ।
अ—अन्तःकरण अनेक हैं, अतः जीव भी अनेक हैं । कारण, जीवोंमें
अन्तःकरण आदि उपाधियाँ होती हैं । अन्तःकरणोंका उपादानमूला-ज्ञान एक है;
वह शुद्ध ब्रह्मके आश्रित है, ब्रह्मको ही विषय किये हुए है और उसकी निवृत्ति
ही मोक्ष है । इसके स्पष्ट रूपसे ये भेद हैं:—
क—मायावच्छिन्न चेतन ईश्वर है । अज्ञानके नाना अंशोंसे अवच्छिन्न
चेतन नाना जीव हैं ।