विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 238, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २२७
करनेमें पहाड़के समान भारी और कठिन हैं॥२॥ अतः हे तुलसीदास ! तू
सुन और जान-बूझकर भ्रममें पड़कर भूल न जा। तू श्रीरामजीका हो जा, जिसे
सबकी लाज है ॥३॥
[ १३२ ]
राम-से प्रीतम की प्रीति-रहित जीव जाय जियत ।
जेहि सुख सुख मानि लेत, सुख सो समुझ कियत ॥१॥
जहँ-जहँ जेहि जोनि जनम महि, पताल, वियत ।
तहँ-तहँ तू विषय-सुखहिं, चहत लहत नियत ॥२॥
कत विमोह लट्यो, फट्यो गगन मगन सियत ।
तुलसी प्रभु-सुजस गाइ, क्यों न सुधा पियत ॥३॥
शब्दार्थ—कियत = कितना। महि = पृथिवी। वियत = आकाश । नियत = प्रारब्ध ।
विमोह = अज्ञान ।
भावार्थ—राम सरीखे प्रीतमके प्रेमसे रहित होकर यह जीव व्यर्थ जीता
है। जिस सुखको तू सुख मान लेता है, जरा समझ तो सही कि वह सुख कितना
है ? अर्थात् सांसारिक सुख क्षणिक हैं, बड़े दुःखदायी हैं ॥१॥ आकाश, पाताल
और पृथिवीमें जहाँ-जहाँ और जिस-जिस योनिमें तूने जन्म लिया, वहाँ-वहाँ तूने
विषय-सुखकी ही कामना की और प्रारब्धवश वही तुझे मिला भी ॥२॥ क्यों तू
अज्ञानमें लुब्ध होकर फटे आकाश (जो कि फटा हुआ नहीं है) की सिलाई
करनेमें मग्न है ? (यदि तुझे सुखकी ही इच्छा है, तो) तुलसीदास कहते हैं कि
तू श्रीरामजीका सुयश गाकर अमृत पान क्यों नहीं करता ? ॥३॥
विशेष
१— 'सुख'—सांसारिक सुख क्या है और कितना है, इसपर भिन्न-भिन्न
आचार्योंका मत देखिये :—
'प्रतीकारो व्याधेः सुखमिति विपर्यस्यति मनः ।
—भर्तृहरि
अर्थात्, किसी व्याधि अथवा दुःखके होनेपर उसका जो निवारण किया
जाता है, उसीको लोग भ्रमवश 'सुख' कहा करते हैं ।