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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 239

२२८ विनय-पत्रिका
ययातिने अपने पुत्र पुरुकी तरुणावस्था माँगकर एक हजार वर्षतक खूब
सुखोपभोग किया। अन्तमें उन्हें जो अनुभव हुआ, वह यह है:—
न जातु कामः कामानां उपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मव भूय एवाभिवर्धते ॥
—महाभारत, आदिपर्व
अर्थात् 'सुखोंके उपभोगसे विषय-वासनाकी तृप्ति नहीं होती; उससे तो
विषय-वासना उसी प्रकार बढ़ती है जैसे हवनके पदार्थोंसे अग्निकी ज्वाला।'
[ १३३ ]
तोसों हौं फिरि फिरि हित, प्रिय पुनीत सत्य वचन कहत ।
सुनि मन, गुनि, समुझि, क्यों न सुगम सुमग गहत ॥१॥
छोटो बड़ो, खोटो खरो, जग जो जहँ रहत ।
अपने अपने को भलो कहहु, को न चहत ॥२॥
बिधि लगि लघु कीट अवधि सुख सुखी, दुख दहत ।
पसु लौं पसुपाल ईस बाँधत छोरत नहत ॥३॥
विषय मुद निहारु भार सिर काँधे ज्यों बहत ।
यों ही जिय जानि, मानि सठ ! तू साँसति सहत ॥४॥
पायो केहि घृत बिचारु, हरिन—वारि महुत ।
तुलसी तकु ताहि सरन, जाते सब लहत ॥५॥
शब्दार्थ—लगि = से । अवधि = तक । लौं = समान । पसुपाल = अहीर, ग्वाला ।
नहत = नाथता है, जोतता है। निहारु = देख। महुत = मथकर । तकु = देख । लहत =
प्राप्त होता है।
भावार्थ—रे जीव ! मैं तुझसे फिर-फिर हितकारी, प्रिय, पवित्र और सत्य-
वचन कहता हूँ। उसे तू सुनकर मनमें गौर करके (गुनकर) और समझकर
सीधा रास्ता क्यों नहीं पकड़ता ॥१॥ संसारमें छोटा-बड़ा, खरा-खोटा जो जहाँ
रहता है, कहो तो, उनमें ऐसा कौन है जो अपना और अपने परिवारका भला
नहीं चाहता ? ॥२॥ ब्रह्मासे लेकर छोटे कीड़ेतक सुखसे सुखी और दुःखसे