विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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अबलौं नसानी, अब न नसैहौं ।
राम-कृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहौं ॥१॥
पायेउँ नाम चारु चिन्तामनि, उर कर ते न खसैहौं ।
स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहौं ॥२॥
परवस जानि हँस्यो इन इन्द्रिन, निज बस ह्वै न हँसैहौं ।
मन मधुकर पनकै तुलसी रघुपति-पद कमल बसैहौं ॥३॥
शब्दार्थ—नसानी = व्यर्थ समय नष्ट हुआ । सिरानी = बीत गयी । डसैहौं = बिछौना
बिछाऊँगा । खसैहौं = गिराऊँगा ।
भावार्थ—अबतक तो मेरा समय व्यर्थ नष्ट हुआ, पर अब मैं अपना जीवन
न बिगाडूँगा । रामजीकी कृपासे संसार-रूपी रात्रि बीत चुकी है, अब जागनेपर
(विरक्तिका भाव उत्पन्न होनेपर) फिर (सोनेके लिए) बिछौना न बिछाऊँगा
(मायामें न फँसूगा) ॥१॥ मैं रामनाम रूपी सुन्दर चिन्तामणि पा गया हूँ, अब
उसे हृदय-रूपी हाथसे न गिराऊँगा । श्रीरामजीके पवित्र और सुन्दर साँवले
रूपकी कसौटीपर अपने चित्त-रूपी सोनेको कसूँगा ॥२॥ अबतक मुझे परवश
जानकर ये इन्द्रियाँ मुझपर हँसती रहीं, किन्तु अब मैं अपने वशमें होकर अपनी
हँसी न कराऊँगा । तात्पर्य, अब मैं मन और इन्द्रियोंके वशमें नहीं हूँ, ये मुझे
विषयोंकी ओर खींचकर न ले जा सकेंगी । तुलसीदास कहते हैं कि अब मैं प्रण
करके अपने मन-रूपी भ्रमरको भगवच्चरणारविन्दमें टिकाऊँगा ॥३॥
विशेष
१—'स्यामरूप......कसौटी'—भगवान्का शरीर श्याम है और कसौटी,
जिसपर सोना कसा जाता है—उसका रंग भी श्याम है । इसलिए यह उपमा
सर्वथा सार्थक है ।
२—'परबस......हँसैहौं'—सब इन्द्रियाँ मनके अधीन हैं और मन जीव-
के अधीन है । किन्तु इन्द्रियोंकी विषयासक्तिसे जीव ही इन्द्रियोंके अधीन हो
जाता है । जब जीव इन्द्रियोंपर अधिकार कर लेता है, वे स्वेच्छानुसार कुमार्ग-
पर जाने नहीं पातीं, तब जीवको स्वतन्त्रता प्राप्त हो जाती है । यों तो जीव