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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 206, कुल 475 में से

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पृष्ठ 206

निष्काम प्रेम दिनोंदिन अधिकसे अधिक बढ़ता जाय ॥२॥ मुझे यह बुरा कर्म
जहाँ-जहाँ (जिस-जिस योनिमें) अपनी जबर्दस्तीसे ले जाय, वहाँ-वहाँ आप वैसे
ही क्षणभरके लिए भी अपनी कृपा न हटाइयेगा, जैसे कछुआ अपने अण्डेको
नहीं छोड़ता ॥३॥ तुलसीदास कहते हैं कि इस संसारमें जहाँतक इस शरीरका
प्रेम, विश्वास और नाता है, वह सब एक जगह सिमटकर केवल परमात्मासे
ही हो ॥४॥
[ १०४ ]
जानकी-जीवन की बलि जैहौं ।
चित कहै रामसीय-पद परिहरि अब न कहूँ चलि जैहौं ॥१॥
उपजी उर प्रतीति सपनेहुँ सुख, प्रभु-पद-विमुख न पैहौं ।
मन-समेत या तनके वासिन्ह, इहै सिखावन दैहौं ॥२॥
श्रवननि और कथा नहिं सुनिहौं, रसना और न गैहौं ।
रोकिहौं नयन बिलोकत औरहिं, सीस ईस ही नैहौं ॥३॥
नातो-नेह नाथसों करि सब नातो-नेह बहैहौं ।
यह छर भार ताहि तुलसी जग जाको दास कहैहौं ॥४॥
शब्दार्थ—नैहौं = प्रणाम करूँगा। छर = भारी। भार = बोझा।
भावार्थ—मैं श्रीजानकीनाथपर बलि जाऊँगा (अपनेको निछावर कर
दूँगा)। मेरा मन कह रहा है कि श्रीसीतारामजीके चरणोंको छोड़कर अब मैं
चलायमान होकर कहीं न जाऊँगा ॥१॥ मेरे हृदयमें यह विश्वास उत्पन्न हो गया
है कि भगवान्‌के चरणोंसे विमुख होनेपर मुझे स्वप्नमें भी सुख न मिलेगा। मनके
सहित इस शरीरके अन्य निवासियों—(इन्द्रियों) को मैं यही उपदेश दूँगा कि
॥२॥ न तो मैं अपने कानोंसे (रामजीकी कथा छोड़कर) किसी औरकी कथा
सुनूँगा, और न जिह्वासे किसी दूसरेका गुणगान करूँगा। और किसीकी ओर
देखनेसे नेत्रोंको रोकूँगा, केवल अपने इष्टदेव-(श्रीरामजी) को ही सिर नवाऊँगा
॥३॥ अपने स्वामीसे स्नेह-सम्बन्ध जोड़कर और तमाम स्नेह-सम्बन्धोंको बहा
दूँगा। तुलसीदास कहते हैं कि मैं इस संसारमें जिसका दास कहाऊँगा, उसीको
अपना यह भारी बोझा सौंप दूँगा ॥४॥