विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १९७
स्वतन्त्र नित्य-मुक्त है ही (गोस्वामीजीने भी लिखा है—‘ईस्वर अंस जीव
अविनासी । सहज अमल चेतन सुखरासी), किन्तु जबतक वह जितेन्द्रिय
नहीं हो जाता, तबतक स्वतन्त्र रहनेपर भी परतन्त्र बना रहता है ।
३—१०४ वें और १०५ वें पदोंमें महाकवि तुलसीदासजीने परमात्माके
सामने अपना कलेजा निकालकर रख दिया है । बहुत सुन्दर !
राग रामकली
( १०६ )
महाराज रामादखो धन्य सोई ।
गरुअ, गुनरासि, सर्वग्य, सुकृती, सूर,
सील-निधि, साधु तेहि सम न कोई ॥१॥
उपल-केवट-कीस-भालु-निसाचर-सबरि-
गीध सम-दम-दया-दान-हीने ।
नाम लिय राम किय परम पावन सकल,
नर तरत तिनके गुनगान कीने ॥२॥
व्याध अपराध की साध राखी कहा,
पिंगलै कौन मति भगति भेई ।
कौन धौं सोमजाजी अजामिल अधम,
कौन गजराज धौं बाजपेयी ॥३॥
पांडु-सुत, गोपिका, विदुर, कुबरी, सबहिं,
सुद्ध किय सुद्धता लेस कैसो ।
प्रेम लखि कुस्त किये आपने तिनहुँ को,
सुजस संसार हरिहर को जैसो ॥४॥
कोल, खस, भील, जवनादि खल राम कहि,
नीच है ऊँच पद को न पायो ।
दीन-दुख-दवन श्रीरघन करुना-भवन,
पतित-पावन विरद वेद गायो ॥५॥