विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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लरिकाई बीती अचेत चित, चंचलता चौगुने चाय ।
जोवन-जुर जुवती कुपथ्य करि, भयो त्रिदोष भरि मदन वाय ॥२॥
मध्य बयस धन हेतु गँवाई, कृषी वनिज नाना उपाय ।
राम-विमुख सुख लह्यो न सपनेहुँ, निसि बासर तयौ तिहूँ ताय ॥३॥
सेये नहिं सीतापति-सेवक, साधु सुमति भलि भगति भाय ।
सुने न पुलकि तनु, कहे न मुदित मन, किये जे चरित रघुबंसराय ॥४॥
अब सोचत मनि बिनु भुजंग ज्यों, विकल अंग दले जरा धाय ।
सिर धुनि-धुनि पछितात्त मींजि कर, कोउ न मीत हित दुसह दाय ॥५॥
जिन्ह लागि निज परलोक बिगाऱ्यौ, ते लजात होत ठाढ़े ठाँय ।
तुलसी अजहुँ सुमिरि रघुनाथहिं, तन्यो गयंद जाके एक नाँय ॥६॥
शब्दार्थ-जाय = व्यर्थ ही। काय = कर्म । चाय = चाव, इच्छा। मदनबाय =
कामोन्माद । ताय = ताप । भाय = भाव । जरा = बुढ़ापा, वृद्धावस्था । दाय = दावानल ।
ठाँय = ठाँव, निकट । नाँय = नाम ।
भावार्थ-व्यर्थ ही जन्म बीत चला, कुछ भी न बन पड़ा ! अत्यन्त दुर्लभ
शरीर पाकर निष्कपट भावसे मन, वचन और कर्मसे राम भजन नहीं किया ॥१॥
लड़कपन तो अज्ञानमें बीत गया, उस समय चित्तमें चंचलताकी चौगुनी चाव
थी। जवानीका ज्वर चढ़नेपर स्त्री (प्रसंग) का कुपथ्य करनेके कारण त्रिदोष
(सन्निपात) हो गया और (समूचे शरीरमें) कामदेवरूपी वायु भर गयी ॥२॥
उसके बाद बीचकी अवस्था मैंने खेती, व्यापार आदि अनेक उपायोंसे धन पैदा
करनेमें खो दी । किन्तु श्रीरामजीसे विमुख होनेके कारण स्वप्नमें भी सुख नहीं
मिला, रात-दिन तीनों तापोंसे तपता ही रहा ॥३॥ न तो श्रीरामजीके भक्तों,
एवं ज्ञानी संतोंकी भक्ति-भावसे भली-भाँति सेवा ही की और न श्रीरघुनाथजीके
सुत सनेह तिय सकल कुटुम मिलि, निसि दिन होत खई ।
पद-नख चन्द्र-चकोर-विमुख मन, खात अँगार मई ॥
विषम विकार-दवानल उपजी, मोह बयार बई ।
भ्रमत भ्रमत बहुतक दुख पायो, अजहुँ न टेव गई ॥
कहा होत अबके पछताने, होनी सिर बितई ।
सूरदास सेये न कृपानिधि, जो सुख सकल मई ॥