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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 176

विनय-पत्रिका १६५
नयन मलिन परनारि निरखि, मन मलिन विषय सँग लागे ।
हृदय मलिन वासना-मान-मद, जीव सहज सुख त्यागे ॥२॥
परनिन्दा सुनि श्रवन मलिन भे, वचन दोष पर गाये ।
सब प्रकार मलभार लाग निज, नाथ-चरन बिसराये ॥३॥
तुलसिदास व्रत-दान, ग्यान-तप, सुद्धि हेतु श्रुति गावै ।
राम-चरन-अनुराग-नीर बिनु मल अति नास न पावै ॥४॥
शब्दार्थ—मल = पाप । नयन = नेत्र । श्रवन = कान । नीर = जल ।
भावार्थ—मोह-जनित अनेक प्रकारके लगे हुए पाप करोड़ों यत्न करनेपर
भी नहीं छूटते। जन्म-जन्मान्तरसे अभ्यास-रत चित्त (पापमें) अधिकाधिक
लिपटता जाता है ॥१॥ परायी स्त्रियोंको देखनेसे नेत्र मलिन हो गये हैं, और
मन विषयोंके साथ लगा रहनेसे मलिन हो गया है। मान-मदादिक वासनाओंसे
हृदय मलिन हो गया है, इसलिए जीवन अपने स्वाभाविक आनन्द-(आत्मानन्द)
को त्याग बैठा है ॥२॥ दूसरोंकी निन्दा सुननेसे कान अपवित्र हो गये हैं तथा
दूसरोंके दोष कहते-कहते वाणी भी मलिन हो गयी है। अपने स्वामी (श्रीरामजी)
के चरणोंको भूल जानेसे ही यह मलका भार सब तरहसे मेरे पीछे लग गया है
॥३॥ ऐ तुलसीदास, वेदका कथन है कि व्रत, दान, ज्ञान और तप आदि शुद्धिके
कारण अवश्य हैं, पर श्रीरामजीके चरणोंके प्रेम-जलके बिना पापोंका समूल नाश
नहीं हुआ करता ॥४॥
राग जैतश्री
[ ८३ ]
कछु ह्वै न आइ गयो जनम जाय ।१
अति दुरलभ तनु पाइ कपट तजि, भजे न राम मन-बचन-काय ॥१॥
१. ऐसा ही भाव महात्मा सूरदासने भी व्यक्त किया है—
दो मैं एकौ तौ न भई ।
ना हरि भजे न गृह सुख पाये, वृथा विहाइ गई ॥
ठानी हुती और कछु मनमें, औरै आनि ठई ।
अविगत गति कछु समुझि परति नहिं, जो कछु करत दई ॥