विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १६३
सुसमय दिन द्वै निसान सबके द्वार बाजै।
कुसमय दसरथ के ! दानि तैं गरीब निवाजै ॥३॥
सेवा बिनु गुनविहीन दीनता सुनाये।
जे जे तैं निहाल किये फूले फिरत पाये ॥४॥
तुलसिदास जाचक-रुचि जानि दान दीजै।
रामचन्द्र चन्द्र तू, चकोर मोहिं कीजै ॥५॥
शब्दार्थ—निवारै = निवारण करने या छुड़ानेवाला। अभिमतदातार = मनोवांछित
या इच्छित फल देनेवाला। दारै = दूर करता है। रूरो = सुन्दर। निसान = नगाड़ा।
भावार्थ—हे देव ! और किससे माँगूँ ? कौन मेरा माँगना (सदाके लिए)
छुड़ानेवाला है ? कौन मनोवांछित फल देनेवाला है जो मेरे दुःख-दरिद्रको दूर
कर दे ? ॥१॥ हे धर्मके स्थान श्रीरामजी ! आप करोड़ों कामदेवोंके सौन्दर्यसे
भी अधिक सुन्दर हैं। आप सब प्रकारसे बुद्धिमान्, मालिक और दान-रूपी
तलवारके चलानेमें बहादुर हैं ॥२॥ अच्छे दिनमें तो दो दिन सबके दरवाजेपर
नगाड़े बजते हैं (सब लोग चार पैसा खैरात करते हैं); पर हे दशरथ-नन्दन !
आप ऐसे दानी हैं कि बुरे समयमें भी (वनवासके समयमें भी जटायु, सुग्रीव,
विभीषण आदि) गरीबोंको निहाल कर देते हैं ॥३॥ बिना सेवाके ही (अहल्या,
शबरी) जिन-जिन गुणहीनोंको (बन्दर, भालू आदिको) दीनता सुनानेपर
आपने निहाल किया है वे पैर फुलाये फिरते हैं ॥४॥ अब भिखारी तुलसीदासकी
रुचि जानकर उसे भी दान दीजिये। हे श्रीरामचन्द्रजी ! आप चन्द्रमा हैं, अतः
मुझे चकोर बना दीजिये—बस यही दान मुझे दीजिये ॥५॥
[ ८१ ]
दीनबन्धु, सुखसिन्धु, कृपाकर, कारुनीक रघुराई।
सुनहु नाथ ! मन जरत त्रिबिध जुर, करत फिरत बौराई ॥१॥
कबहूँ जोग रत, भोग-निरत सठ हठ वियोग बस होई।
कवहूँ मोह-बस द्रोह-करत बहु, कबहूँ दया अति सोई ॥२॥
कवहूँ दीन, मतिहीन, रंकतर, कवहूँ भूप अभिमानी।
कवहूँ मूढ़, पंडित विडंबरत, कवहूँ धर्मरत ग्यानी ॥३॥