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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 139

१२८ विनय-पत्रिका
भी खूब हैं। जैसे, कामको सिंह कहा गया है। आशय यह है कि जिस प्रकार
सिंह सब पशुओंका नाश करता है, वैसे ही कामकी प्रबलतासे सब गुण नष्ट हो
जाते हैं। कर्मोंकी उपमा वृक्षोंके साथ दी गयी है। जिस प्रकार वृक्ष अनेक
प्रकारके होते हैं उसी प्रकार कर्मके भेद भी कई प्रकारके हैं, जैसे कर्म, अकर्म
और विकर्म; अथवा संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण; अथवा सकामकर्म और
निष्काम कर्म आदि। मत्सर को 'क्रूर महिष' कहा गया है। अर्थात् जिस प्रकार
भैंसा किसीको व्यर्थ ही मारता है, पर मांस नहीं खाता, उसी प्रकार मत्सर-
स्वभाव भी किसीका भला नहीं देखता। वह अपना कुछ भी लाभ न रहनेपर
भी दूसरोंका अहित करता है। मनन करनेपर पाठकोंको प्रत्येक रूपकमें इसी
प्रकारकी सार्थकता दिखलाई पड़ेगी।
२—'रूपादि सब सर्प'—जिस प्रकार सर्प प्राणनाशक है, उसी प्रकार
शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धादि विषय भी। जिन इन्द्रियोंके ये शब्दादि विषय हैं,
उन इन्द्रियोंके सम्बन्धमें किसी विद्वान्ने क्या ही सुन्दर कहा है—
पतंगमीनभृङ्गालयोलयं प्रयान्ति पंचेन्द्रियपंचगोचरैः।
मयातु तत्पंचकमेव सेव्यते गतिर्न जाने मम का भविष्यति ॥
एते च जि क्षणनासिकादयश्चौरास्तु सश्रन् मम देहवासिनः ।
लुम्पन्ति सर्व्वात्मधनं प्रमाथिनो नाद्यप्यवेक्ष्ये मम पश्यताम्यताम् ॥
३—'व्यालादगामी' कहनेका अभिप्राय यह है कि मैं रूप-रसादिरूपी
सर्पोंके बीचमें पड़ा हुआ हूँ, अतः आप मेरी रक्षा कीजिये; क्योंकि आप सर्पको
भक्षण करनेवाले गरुडपर चढ़कर चलनेवाले हैं।
( ६० )
देव—
नौमि नारायनं, नरं करुनायनं,
ध्यान-पारायनं, ज्ञान-मूलं।
अखिल संसार-उपकार-कारन, सदय
हृदय, तपनिरत, प्रनतानुकूलं ॥१॥