विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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ज्ञान देत ध्यान देत आतम विचार देत ब्रह्मको बताइ देत ब्रह्म में चतुर हैं।
सुन्दर कहत जग संत कछु देत नाहीं संतजन निसिदिन देवोई करतु हैं ॥
( ५८ )
देव—
देहि अवलंब करकमल, कमलारमन,
दमन-दुख, समन-संतापभारी !
अज्ञान-राकेस-ग्रासन विधुंतुद गर्व-
काम-करिमत्त-हरि, दूपनारी ॥१॥
वपुष ब्रह्मांड सुप्रवृत्ति लंका-दुर्ग,
रचित मन दनुज मय-रूपधारी ।
विविध कोसौघ, अति रुचिर मंदिर-निकर,
सत्वगुन प्रमुख त्रैकटककारी ॥२॥
कुनप-अभिमान सागर भयंकर घोर,
विपुल अवगाह, दुस्तर अपारं ।
नक्र-रागादि-संकुल मनोरथ सकल,
संग-संकल्प बीची-विकारं ॥३॥
मोह दसमौलि, तद्भ्रात अहँकार,
पाकारिजित काम विश्रामहारी ।
लोभ अतिकाय, मत्सर महोदर दुष्ट,
क्रोध पापिष्ट विबुधांतकारी ॥४॥
द्वेष दुर्मुख, दंभ खर, अकंपन कपट,
दर्प-मनुजाद मद-सूलपानी ।
अमित बल परम दुर्जय निसाचर-निकर,
सहित षड्वर्ग गो-जातुधानी ॥५॥
जीव भवदंघ्रि-सेवक विभाषन बसत,
मध्य दुष्टाटवी ग्रसित चिंता ।
नियम-यम सकल सुरलोक-लोकेस,
लंकेस-वस नाथ ! अत्यंत भीता ॥६॥