विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 132, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १२१
जन्म-रूपी त्रिविध रोगोंके लिए भक्ति ही दवा है और अद्वैतदर्शी अर्थात् परमेश्वर-
के सिवा दूसरा कोई भी पदार्थ न देखनेवाला भक्त (साधु) ही वैद्य है ।
मलिनबुद्धि तुलसीदास कहता है कि सन्त और भगवान्में कभी किंचित् भी
भेद नहीं है ॥९॥
विशेष
१—'वृत्रासुर' नामक असुर बड़ा प्रतापी और परमभक्त था । इसका वध
करनेके लिए देवता लोग दधीचिके पास उनकी हड्डी माँगने गये थे और उस
परमदानी ऋषिने देवलोकके उपकारार्थ अपने शरीरका त्याग किया था । उनकी
एक हड्डीसे इन्द्रका वज्र बना था और उसीसे इन्द्रने वृत्रासुरको मारा था ।
२—'बाणासुर'—राजा बलिका पुत्र था । इसके हजार भुजाएँ थीं । यह
शिवभक्त था । इसकी पुत्री ऊषा स्वप्नमें भगवान् श्रीकृष्णके पौत्र अनिरुद्धका
रूप देखकर मोहित हो गयी थी । उसने अपनी सखी चित्रलेखा द्वारा पता
लगाकर अनिरुद्धको अन्तःपुरमें बुला लिया । यह बात मालूम होते ही बाणा-
सुरने उन्हें कैद कर लिया । इसके लिए बाणासुर और श्रीकृष्णमें घोर
संग्राम हुआ । इस युद्धमें बाणासुरकी ओरसे शिवजी भी लड़े थे । जब
बाणासुरके सब हाथ कट गये, सिर्फ चार हाथ शेष रहे, तब वह ईश्वर-भक्त
हो गया । शिवजीके अनुरोधसे भगवान्ने उसे अभय कर दिया । यह कथा
श्रीमद्भागवतमें है ।
३—'मय' नामक दैत्यके कला-कौशलकी प्रशंसा महाभारत, रामायण आदि
ग्रंथोंमें मिलती है । लंकाका निर्माण इसीने किया था । महाभारतकालीन इन्द्र-
प्रस्थके अपूर्व नगरका निर्माता भी यही था । यह ईश्वरका भक्त था ।
४—'द्विजबन्धु' अजामिलके लिए आया है । यह बड़ा पापी ब्राह्मण था ।
इसके छोटे लड़के का नाम नारायण था । मरते समय इसने भयभीत होकर
अपने पुत्रको 'नारायण' कहकर पुकारा था । इससे उसका उद्धार हो गया ।
५—'जवनादि'—४६ पदके विशेषमें देखिये ।
६—'संत भगवंत' सन्त-महिमापर सुन्दर कविने खूब कहा है:—
साँचो उपदेश देत भली भली सीख देत समता सुबुद्धि देत कुमति हरतु हैं ।
मारग दिखाय देत भावहु भगति देत प्रेमकी प्रतीति देत अभरा भरतु हैं ॥