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सर्वकोश
विक्रमोर्वशीयम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

विक्रमोर्वशीयम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Vikramorvashiyam of Kalidasa with Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished168 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

द्वितीयोग्ङ्कः । ५३
चेटी—अलीय किं गए भहिणी विण्णविदपुव्वा ।
देवी—तेण हि एदाविदव्वउरिदा मुणिग्गे दाय दीवग्भम
तिणाद ज तुए कहिद राथ ण पवि ।
चेटी—जं देवीए रणदि ।
देवी—(परिक्रम्य पुरस्तावलोक्य च ।) णिंडणिण, किं तु एद
गए णवचीअर विम इदो दक्खिरणमग्गेण आणीअदि ।
चेटी—(विभाव्य) भैट्टिणि, पच्चितणविभाविदवगरं मुक्कइदं
वायु दिस्सै । हव, कह देवीए ए व चेट्टखेत्तिव्वाए । (प्रविश्य)
कह दाचीअदु एदम् ।
(देवी—अपलोगिहि दाय बदण। यदि अपरिरदं तदो गुणिस्सम्।
१ अलीक नया भ' नी विज्ञापितपूव्वी ।
२ नत हि एनावियारित्रा सोटेरार्थं माम्मदर्शति कापद
यदि। रात्य न पं थ ।
३ यद्‌न्या शेवत ।
विमुक्तेषु १२ २९३ एव दिव्वो यत्तो दूरि ४५ ४१ती