विक्रमोर्वशीयम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Vikramorvashiyam of Kalidasa with Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयो ऽङ्कः । ५१
द्विपदिका—(गाती है, [मलय-पवनका अभिनय] करके) मलय
के शिखरोंपर उत्पन्न होकर तुम जिसके स्पर्शसे शीतल होकर आनन्दित
हुए हो वह कहाँ है ?
राजा—(सुनकर वयस्यको दिखाकर) अरे मित्र ! यह तो मलय-शिखण्डी ही
है, यह लो। विशुद्ध रूपका आनन्द लो।
(इसके बाद चेटियाके साथ साभरणवसना वासवदत्ताका प्रवेश होता है)
राजा—( देखकर ) देवि ! देवि ! अद्भुत संगति है।
विदूषकः—(राजाको दिखाकर) अरे मित्र—(स्वगतम् सोचकर)
उचित नामका यह वासवदत्ता-औषधिरूप मलय आ गया तो तुम्हारा मलय-
विकार दूर हो ही जायगा ।
राजा—विरमति मलयपवनः ।
विदूषकः—भो वयस्य, पश्यैतां बन्धुजीवशेफालिकामिव । क्या अब भी तुम्हारे विकार
तुमपर ? किमिदानीं तव हृदयप्रियायाः पुरतस्तिष्ठसि । तो क्या तुम्हारा हृदयप्रियाके
सम्मुख ही बैठना चाहिए ?
१. द्विपदिका एक छन्द है जिसके द्वारा—गीतका भेद ।
२. इस श्लोकका भाव यह हुआ ।
३. ४. ५. ६. ७. टि० सं०