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सर्वकोश
विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)

Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary

महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished493 पृष्ठ

पृष्ठ 461, कुल 493 में से

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पृष्ठ 461

( ४५८ )
शरासनं धुनीते सञ्चालयति तर्हि धुनोतु नाम सञ्चालयतु, तदीयं कार्यं
भृङ्गमधुपकोकिलैः सम्पादितमेवेति भावः ।
भाषा
स्तुतिपाठ कर जगाने वाले वैतालिक रूपी भौरों ने, सब विरहिजनों के
समूहों का संहार करने में प्रबल और स्त्री पुरुषों की परस्पर संभोग की अभिलाषा
के सहायक, वसन्तऋतु की, अथवा कामदेव के मित्र वसन्त ऋतु को, मानो यश
प्रशस्ति का पाठ करना प्रारम्भ कर दिया है। अर्थात् वसन्त ऋतु के आने से
भौरों की गुंजार चारो ओर होने लगी है जो कामोत्पादक है। तीनों लोकों की
मानिनियों के कोप को हठात् दूर कर देने वाली कोकिलाओं की कूक भी प्रारम्भ
हो गयी है । अगर इसके ऊपर भी कामदेव, खेलवाड़ में अपने फूलों के धनुष्य
को चलाने लगें तो भले ही चलावें, उनका कार्य तो भृङ्ग आदि सेवकों ने कर
ही दिया है ।
कूजत्कोकिलकोपिता गुलिधनुःशिक्षां समासेवते
खिन्ना चन्दनमारुतेन मलये दावाग्निमाकाङ्क्षति ।
किञ्चान्विष्यति दुमना दलयितुं कामेन मैत्रीं मधोः
कर्तुं धावति दुर्लभे त्वयि सखी कां कां न वातूलताम् ॥६६॥
अन्वयः
त्वयि दुर्लभे (सति), सखी कूजत्कोकिलकोपिता (सती) गुलिधनुःशिक्षां
समासेवते । चन्दनमारुतेन खिन्ना (सती) मलये दावाग्निम् आकाङ्क्षति ।
किञ्च दुर्मनाः (सती) कामेन मधोः मैत्रीं दलयितुम् अन्विष्यति । कां कां
वातूलतां कर्तुं न धावति ।
व्याख्या
त्वयि दिष्टक्रमाद्देवे दुर्लभे दुष्प्राप्ये सति त्वद्वियोगावस्थायामित्यर्थः । सखी
कामिनी कूजद्भिः शब्दं कुर्वाणं कोकिलं पिकैः कोपिता रोषं प्रापिता सती
गुलिधनुषो मृद्गुलिकां निघाय येन यन्त्रेण वानरेषु पक्षिषु च गुलिकाप्रहारं
क्रियते तद्यन्त्रं तस्य "धनुही" "गुलेला" इति भाषायां प्रसिद्धस्य, शिक्षामभ्यासं
समासेवते करोति । कोकिलशब्देन त्वद्वियोगावस्थायां पीडा न भवेदिति कोकिल-
दूरीकरणार्थं गुलिधनुषोऽभ्यास प्रारभत इति भावः । चन्दनवायुना चन्दनगन्ध-