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वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

विषयीकृत्य प्रवर्त्तमानं दीपप्रभामंडलं घटपटावरकांधकारनि-

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( १०३ )
विषयीकृत्य प्रवर्त्तमानं दीपप्रभामंडलं घटपटावरकांधकारनि-
रसनपुरःसरं स्वप्रभया तदपि भासयति तद्वदित्यर्थः ॥ ८८ ॥
( भा०टी० ) अखण्डाकार अन्तःकरणकी वृत्ति सेघ-
टादि जड पदार्थाकार अन्तःकरण की वृत्तिका कुछ विशेष
है । घटका प्रत्यक्ष होनेके समय घटाकार चित्तवृत्ति अज्ञात
घटको विषय करके उसकी अज्ञानका नाश करती हुई अन्तः
करण वृत्तिके प्रतिबिम्बद्वारा अर्थात् स्वगत चिदाभासके द्वारा
घटका प्रकाश करतीहै। इस विषयमें प्रमाण भी है-“अन्तः-
करणवृत्ति और तद्गत प्रतिबिम्बित चैतन्य यह दोनोंही घ-
टको प्राप्त होतेहैं परन्तु अन्तःकरणकी वृत्तिद्वारा घटके
अज्ञानका विनाश होताहै और प्रतिबिम्बित चैतन्यद्वारा घट
प्रकाशित होताहै। जैसे दीपककी प्रभा अन्धकारमें रक्खे हुए
घटपटादिको प्राप्त होकर घटपटादिगत अन्धकारका विनाश
करके उनका प्रकाश करतीहै । तिसी प्रकार अन्तःकरणकी
वृत्तिद्वारा घटादिका अज्ञान नष्ट होताहै और अन्तःकरण
प्रतिबिम्बित चैतन्यके द्वारा घटादिका प्रकाश होता है ८८ ॥
एवंभूतस्वस्वरूपचैतन्यसाक्षात्कारपर्य्यन्तं श्रवण
मनननिदिध्यासनसमाध्यनुष्ठानस्याप्यपेक्षितत्वा-
त्तेऽपि प्रदर्श्यन्ते । श्रवणं नाम षड्विधलिङ्गैरशेषवेदा
न्तानामद्वितीयवस्तुनि तात्पर्यावधारणम् । लिङ्गा
नि तु उपक्रमोपसंहाराभ्यासापूर्वताफलार्थवादो
पपत्त्याख्यानि । तदुक्तम्-“उपक्रमोपसंहारावभ्या

( १०४ ) वेदान्तसार ।
सोऽपूर्वता फलम् । अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं तात्प
र्यनिर्णये” ॥ ८९ ॥
(सं०टी०) इयता ग्रंथजालेन प्रतिपादितस्य प्रत्यगभि-
न्नपरमानंदाखंडचैतन्यस्य साक्षात्कारलक्षणमखंडाकारांतःक-
रणवृत्तिं प्रतिपिपादयिषुः तत्साधनभूतश्रवणादेरवश्यानुष्ठेयत्वं
तेषां लक्षणानि च क्रमेण दर्शयति।एवंभूतेत्यादिना अद्वैतं वस्तु
भासत इत्यंतेन ग्रंथेन । एवंभूतेति । एवंभूतस्योक्तश्रुतियु-
क्त्यनुभवैर्निरस्तसमस्तोपाधिप्रत्यगभिन्नपरमानंदचिद्रूपस्य सा-
क्षात्कारपर्यंतं श्रवादीन्यनुष्ठेयानीति प्रतिजानीते । तेपीति ।
श्रवणादयोपीत्यर्थः । तत्र श्रवणस्य लक्षणमाह । षड्विधेति ।
लीनमर्थं गमयतीति लिङ्गशब्दस्य व्युत्पत्तेः ब्रह्मात्मैकत्वनि-
श्चायकैरुपक्रमोपसंहारादिषड्विधलिङ्गैः सर्वेषां वेदांतवाक्याना-
मद्वितीये ब्रह्मणि तात्पर्यनिश्चयश्रवणमित्यर्थः । तानि च लिं-
गानि क्रमेणोपदिशति । उपक्रमेति। तथा चोक्तम्“उपक्रमोप-
संहारावभ्यासोऽपूर्वता फलम् । अर्थवादोपपत्ती च लिंगं ता-
त्पर्यनिर्णये ” इति ॥ ८९ ॥
(भा०टी०) इस प्रकार परमात्मा चैतन्यके साक्षात्कार
होनेतक श्रवण, मनन, निदिध्यासन, समाधि, और अनुष्ठान
यह आवश्यक होते हैं इस कारण अब श्रवणादिके लक्षण
दिखलाते हैं। छः प्रकारके लिङ्गोंके द्वारा अद्वितीय ब्रह्ममें
सम्पूर्ण वेदान्तके तात्पर्य्यका अवधारण करना श्रवण कहाता
है। छः प्रकारके लिङ्ग ये हैं—उपक्रमोपसंहार, अभ्यास, अ-