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वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 145 में से

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पृष्ठ 95

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । (९५)
विरुद्धपरोक्षत्वादिवैशिष्ट्यांशपरित्यागेनाविरुद्धाखण्डचैतन्य-
मात्रप्रतिपादकत्वं तस्येत्यर्थः ॥ ८४ ॥
( भा०टी० ) जैसे "सोऽयं देवदत्तः" इस वाक्यमें पूर्व
कालमें देखाहुआ और वर्त्तमानकालमें देखाहुआ जो देवदत्त-
रूप वाच्यार्थ उसका एक अंशमें विरोध होनेसे विरुद्ध अंश जो
पूर्व काल है उसमें और वर्तमान काल में है उसका परित्याग
करके देवदत्त रूप अंश लक्ष्यार्थ होताहै । तिसी प्रकार
"तत्त्वमसि" इस वाक्यमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष चैतन्य
का ऐक्यरूप जो वाच्यार्थ है उसके एकांशमें विरोध होनेसे
विरुद्ध अंश प्रत्यक्षत्व और अप्रत्यक्षत्व उसका परित्याग क
रके अविरुद्ध अखण्ड चैतन्यांशमात्र लक्ष्यार्थहोताहै॥ ८४ ॥
अथाधुना अहं ब्रह्मास्मीत्यनुभववाक्यार्थो वर्ण्यते।
एवमाचार्य्येणाध्यारोपापवादपुरःसरं तत्त्वम्पदा-
र्थौ शोधयित्वा वाक्येनाखण्डार्थेऽवबोधितेऽधिका-
रिणोऽहं नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-सत्य-स्वभाव-
परमानन्दा-नन्ताद्वयं ब्रह्मास्मीत्यखण्डाकाराका-
रिता चित्तवृत्तिरुदेति। सा तु चित्प्रतिबिम्बसहिता-
सती प्रत्यगभिन्नमज्ञातं परं ब्रह्म विषयीकृत्य तद्ग-
ताज्ञानमेव बाधतेतदा पटकारणतन्तुदाहे पटदाह-
वदखिलकार्य्यकारणेऽज्ञाने बाधिते सति तत्का-
र्य्यस्याखिलस्य बाधितत्वात् तदन्तर्भूताखण्डा-
काराकारिता चित्तवृत्तिरपि बाधिता भवति॥८५॥