वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 75, कुल 145 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । (७५)
मय जैसे सर्पज्ञान नष्ट होजाय है तब केवल रज्जुका ज्ञान रह
जाय है । तिसीप्रकार सच्चिदानन्द ब्रह्ममें अवस्तुरूप अज्ञाना-
दि जड पदार्थका भ्रम होकर जिस समय उस भ्रमका नाशहो
जाता है तब केवल ब्रह्ममात्र अवस्थित रहता है क्योंकि यह
रूप ज्ञानका विवर्त्त है जैसा ग्रन्थान्तरमें कहा है-“जो स्व-
रूपको विकृत करके कार्य्यको उत्पादन करै वह विकारी वा
परिणामी उपादान कारण कहाता है जैसे दूध दधिका विकारी
वा परिणामी उपादानकारण है ” और जो कारणस्वरूपका
विकार विनाही करे कार्य्यका उत्पादन करै है वह उसको
विवर्त्त कारण कहते हैं जैसे रज्जु सर्पके ज्ञानके प्रति
विवर्त्त कारण है ॥ ७२ ॥
तथाहि खलूच्यते यथा एतद्भोगायतनं चतुर्विधं
स्थूलशरीरजातं एतद्भोग्यरूपान्नपानादिकं. एत-
दाश्रयभूतभूरादिचतुर्दशभुवनानि एतदाश्रयभूतं
ब्रह्माण्डञ्चैतत् सर्वं एतेषां कारणरूपपञ्चीकृतभूत-
मात्रं भवति । एतानि शब्दादिविषयसहितानि प-
ञ्चीकृतभूतजातानि सूक्ष्मशरीरजातञ्चैतत् सर्वमे-
तेषां कारणरूपमपञ्चीकृतभूतमात्रं भवति एतद-
ज्ञानं अज्ञानोपहितं चैतन्यं चेश्वरादिकं एतदाधा-
रभूतानुपहितचैतन्यरूपं तुरीयब्रह्ममात्रं भवति
आभ्यामध्यारोपापवादाभ्यां तत्त्वंपदार्थशोधनम-
पि सिद्धं भवति । तथाहि । अज्ञानादिसमष्टिः ए-