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सर्वकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 145 में से

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पृष्ठ 73

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । (७३)
इसप्रकार दृढ़ अनुभव होता है इसकारण पुत्रको आदिले
शून्यपर्य्यन्त कोई पदार्थ आत्मा नहीं कहाजासक्ता । पुत्रा-
दिको आत्मा कहनेपर पूर्वोक्त श्रुति, युक्ति, अनुभव, प्रमा-
णका विरोध होगा इसकारण पुत्रादिको अनात्मत्व स्पष्ट
मालूम होता है ॥ ७० ॥
अतस्तत्तद्भासकं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तसत्य
स्वभावं प्रत्यक्चैतन्यमेवात्मतत्त्वमिति
वेदान्तविदनुभवः । एवमध्यारोपः ॥ ७१ ॥
(सं०टी०) विशेषाध्यारोपप्रकरणमुपसंहरति।एवमिति७१
(भा०टी०) ठीक तौ जो पुत्रको आदिले शून्य प-
र्य्यन्तका प्रकाशक है और जो नित्य, शुद्ध, सर्वज्ञ, मुक्त, स-
त्यस्वरूप, प्रत्यक् चैतन्य है वही आत्मा है ऐसा वेदान्तशास्त्र
के जाननेवालोंका अनुभव है । इसप्रकार वस्तुमें अवस्तुका
अध्यारोपस्वरूप अध्यारोपन्यायविशेषरूपसे दिखाया।७१॥
अपवादोनाम रज्जुविवर्त्तस्य सर्पस्य रज्जुमात्रत्व-
वत् वस्तुविवर्त्तस्यावस्तुनोऽज्ञानादेः प्रपञ्चस्य
वस्तुमात्रत्वम् । तदुक्तम्“सतत्त्वतोऽन्यथाप्रथा
विकारइत्युदीरितः । अतत्त्वतोऽन्यथाप्रथाविवर्त्त-
इत्युदाहृतः” ॥ ७२ ॥
(सं०टी०) आत्मवस्तुनि मिथ्याप्रपंचस्य सामान्यतो
विशेषतश्चाध्यारोपप्रकारं सप्रपंचमभिधायेदानीं तदपवादप्र-