वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 69, कुल 145 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ६९ )
घन तथा आनन्दमय है”और इसप्रकार युक्ति प्रमाण देते हैं
कि-“सुषुप्तिकालमें सबके लीन होनेपरभी अज्ञानोपहित चै-
तन्यका प्रकाश रहता है और मैं अपनेको नहीं जानता हूँ
ऐसा अनुभव होता है । इसकारण अज्ञानोपहितचै-
तन्यही आत्मा है” ॥ ६७ ॥
अपरो बौद्धः“असदेवेदमग्र आसीदित्या-
दिश्रुतेःसुषुप्तौ सर्वाभावादहं सुप्तःसुषुप्तौ
नासमित्युत्थितस्य स्वभावपरावर्शविष-
यानुभवाच्च शून्यमात्मेति वदति ॥ ६८॥
( सं०टी० ) बौद्धैकदेशी कश्चिच्छ्रुत्यादिभिः शून्यमा-
त्मेति वदतीत्याह । अपर इति ॥ ६८ ॥
( भा ०टी० ) कोई बौद्धमतावलम्बी शून्यकोही आ-
त्मा कहते हैं । और इस श्रुतिका प्रमाण देते हैं-“जगत् प-
हले असत् था ” और यह युक्ति देते हैं कि-“सुषुप्तिकालमें
बुद्ध्यादि सबका अभाव होता है और सुषुप्तिसे उठकर पुरुष
को ऐसा ज्ञान होता है कि सुषुप्तिमें मेरा अभाव होगया था
इस अनुभवके कारण शून्यही आत्मा है” ॥ ६८ ॥
एतेषां पुत्रादीनां शून्यपर्यन्तानामनात्मत्वमुच्य-
ते। एतैरतिप्राकृतादिवादिभिरुक्तेषु श्रुतियुक्त्यनु-
भवाभासेषु पूर्वपूर्वोक्तश्रुतियुक्त्यनुभवाभासाना-
मुत्तरोत्तरश्रुति युक्त्यनुभवाभासैरात्मवाद्यदर्शना-
त्पुत्रादीनामनात्मत्वं स्पष्टमेवेति ॥ ६९ ॥