वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 68, कुल 145 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६८ ) वेदान्तसार ।
आनन्दमयः” इत्यादिश्रुतेः सुषुप्तौ बुद्ध्या-
दीनामज्ञाने लयदर्शनात् ‘अहमज्ञः’ इत्या-
द्यनुभवाच्च अज्ञानमात्मेति वदतः ॥ ६६ ॥
( सं०टी० ) उक्तेभ्योऽतिरिक्तो प्राभाकरतार्किकौ स्वमतो
पयोगिश्रुत्यादिसद्भावादज्ञानमात्मेति वदत इत्याह। प्राभाक-
रतार्किकाविति ॥ ६६ ॥
( भा०टी० ) प्राभाकर ( मीमांसक ) और तार्किक ( नै-
यायिक ) तो दोनों अज्ञानकोही आत्मा कहते हैं और इस
श्रुतिका प्रमाण देते हैं-“अन्तरात्मा शरीरादिसे भिन्न और
आनन्दमय है । ”और इसप्रकार युक्ति प्रमाण देते हैं कि-
“सुषुप्ति अवस्थामें अज्ञानमें बुद्ध्यादिका लय होता है और
‘मैं मूर्ख हूँ मैं ज्ञानी हूँ’ इसप्रकार अनुभवभी यावन्मात्रको हो-
ता है इसकारण अज्ञानही आत्मा है” ॥ ६६ ॥
भट्टस्तु “प्रज्ञानघनएवानन्दमयआत्मा”
इत्यादिश्रुतेःसुषुप्तौप्रकाशाप्रकाशसद्भा-
वात् मामहं जानामीत्याद्यनुभवाच्च अ-
ज्ञानोपहितं चैतन्यमात्मेति वदति ॥ ६७ ॥
( सं०टीका ) अन्यभट्टस्त्वज्ञानावच्छिन्नचैतन्यमात्मे-
त्याह । भट्टस्त्विति ॥ ६७ ॥
( भा०टी० ) भट्टमतावलम्बी कोई मीमांसक अज्ञान-
समष्टिद्वारा उपहित चैतन्य अर्थात् ईश्वरचैतन्यकोही आत्मा
कहते हैं और इस श्रुतिका प्रमण देते हैं-“आत्माही प्रज्ञान-