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सर्वकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 145 में से

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पृष्ठ 48

( ४८ ) वेदान्तसार ।
( भा०टी० ) पूर्व कहेहुए प्राणादि पञ्चवायु और कर्मे-
न्द्रियोंका मिलकर प्राणमय कोश होता है गमन आगमन इ-
त्यादि क्रिया प्राणादि पञ्चवायुका स्वभाव है इसी कारण यह
पञ्चवायु सम्पूर्ण राजसअंशका कार्य्य मालूम होता है । पूर्व
कहेहुए कोशोंके मध्यमेंज्ञानशक्तियुक्त विज्ञानमय कोश कर्त्ता
है । इच्छाशक्तियुक्त मनोमयकोश करण है । क्रियाशक्ति-
युक्त प्राणमय कोश कार्य्य है इसप्रकार तीनों कोशोंका वि-
भाग वर्णन करते हैं । यही तीनों कोश मिलकर कोशसमष्टि-
का सूक्ष्मशरीर कहलाता है ॥ ४७ ॥
अत्राप्यखिलसूक्ष्मशरीरमेकबुद्धिविषय-
तया वनवज्जलाशयवद्वा समष्टिः।अनेक-
बुद्धिविषयतया वृक्षवज्जलवद्वा व्यष्टिश्च
भवति । एतत्समष्ट्युपहितं चैतन्यं सू-
त्रात्मा हिरण्यगर्भः प्राण-इति चोच्यते
सर्वानुस्यूतत्वात् । ज्ञानेच्छाक्रियाशक्ति-
मदपंचीकृतपंचमहाभूताभिमानित्वाच्च ॥४८॥
( सं०टी० ) अस्य समष्टित्वे हेतुमाह । अत्रापीति ।
एकबुद्ध्येति । चराचरप्राणिमात्रस्य यावंत्यनंतानि सूक्ष्मश-
रीराणि तेषां सर्वेषां सूक्ष्मशरीराणां सूत्रात्मनाहिरण्यगर्भाख्येन
स्वीयकैबुद्ध्या विषयीकृतत्वात्समष्टित्वमित्यर्थः । तत्र
दृष्टांतमाह । वनवदित्यादि । अस्यैव सूक्ष्मशरीरस्य व्य-
ष्टित्वं दर्शयति । अनेकेति । अनेकेषां जीवानां प्रत्येकं स्वस्व-