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सर्वकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 145 में से

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पृष्ठ 27

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत। ( २७ )
ति। ईश्वरगतमूलाज्ञानस्य जीवगताहंकारादिविक्षेपसंस्कारादि-
रूपाज्ञानस्य वस्तुत एकत्वेन तदवभासकेश्वरजीवचैतन्ययोर-
प्येकत्वमित्यर्थः ॥ २८ ॥
( भा०टी० ) उक्त अज्ञानकी व्यष्टि अपकृष्ट उपाधि है
इसीसे अज्ञानकी व्यष्टिसे तमोगुणमिश्रित सत्वगुण प्रधान
है । इसी व्यष्टिभूत अज्ञानसे उपहित चैतन्य प्राज्ञशब्दसे क-
हा जाता है इसी व्यष्टिभूत अज्ञानोपहित चैतन्यमें अल्पज्ञत्व
और अनीश्वरत्व आदि गुण रहते हैं । इसी कारण व्यष्टिभूत
अज्ञानोपहित चैतन्य अलग अलग एक एक अज्ञानका प्र-
काशक है इसी कारण इसको प्राज्ञ, और मलिनसत्त्वप्र-
धान, अस्पष्ट उपाधिसे उपहित होनेसे अनतिप्रकाशक ( अ-
ल्पप्रकाशक ) कहते हैं ॥ २८ ॥
अस्यापीयमहङ्कारादिकारणत्वात्कारण-
शरीरम्।आनन्दप्रचुरत्वात्कोशवदाच्छा-
दकत्वाच्च--आनन्दमयःकोशः। सर्वोपर-
मत्वात्सुषुप्तिः। अत एव स्थूलसूक्ष्मश-
रीरलयस्थानमिति चोच्यते ॥ २९ ॥
( सं०टी० ) सौषुप्तजीवचैतन्यस्य प्राज्ञत्वं साधयति ।
अस्येति । संस्काररूपास्पष्टोपाधितया तदावृतत्वेनातिप्र-
काशकत्वाभावान्प्राज्ञत्वमस्येत्यर्थः। यथा जगत्कारणेश्वरोपा-
धेःकारणशरीरत्वेनानंदप्रचुरत्वेन चानंदमयत्वं कोशदृष्टांतेन च
कोशत्वं तथैतत्सर्वं तारतम्येन प्राज्ञचैतन्येऽप्यतिदिशति । अहं-