वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 10, कुल 145 में से
संदर्भ में पढ़ें( १० ) वेदान्तसार ।
वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन" इत्यादि-
श्रुतेः “ तपसा कल्मषं हन्ति ” इत्यादिस्मृतेश्च ।
नित्यनैमित्तिकयोरुपासनानाञ्च अवान्तरफलं
पितृलोकसत्यलोकप्राप्तिः “ कर्म्मणा पितृलोको
विद्यया देवलोकः” इत्यादिश्रुतेः ॥ ७ ॥
( सं०टी० ) एतदेव स्पष्टं व्याकरोति ॥ काम्यानि स्व-
र्गादीनि ॥ ७ ॥
( भा०टी० ) स्वर्गादिसुखप्राप्तिका कारणरूप-अग्निष्टो-
मादि यज्ञका नाम काम्यकर्म्म है । नरकादि दुःखभोगका
साधन-ब्राह्मणवधादि निषिद्धकर्म्म कहाताहै । जिनके न क-
रनेसे अनेक पाप उत्पन्न होजायँ, ऐसे सन्ध्यावन्दनआदि नित्य
कर्म्म कहातेहैं । पुत्रोत्पत्ति आदि कर्म्मोंके उद्देशसे किये-
जायँ ऐसे जातेष्टि आदि कार्योंको नैमित्तिक कर्म्म कहते-
हैं । जिनके करनेसे पापोंका नाश हो ऐसे चान्द्रायण आदि
व्रत प्रायश्चित्त कहाते हैं । सगुण ब्रह्मविषयक चित्तकीएका-
ग्रतारूप शान्तिआदि विद्या ( शाण्डिल्यविद्या ) को उपा-
सना कहतेहैं । उपरोक्त नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित्त इनका
केवल चित्तशुद्धिके निमित्त प्रयोजन है । उपासनाका मुख्य
प्रयोजन केवल चित्तकी एकाग्रताके निमित्त है । अन्तःकर-
णकी निर्म्मलता होनेपर पहले कहेहुए नित्य आदि कार्यों-
का कोई प्रयोजन नहीं रहता है । इस विषयमें श्रुति प्रमाण
है-“वेद पढ़ना यज्ञ करना तप करना और अनशन ( चान्द्रा-