वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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इससे मन्त्रशिखा का उद्भव होता है जो कि—'सर्वमन्त्र प्रदीपिका' है । जिस प्रकार
तमाच्छन्न घर में कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता उसी प्रकार मन्त्रशिखाहीन मन्त्र की भी
स्थिति है अतः—मन्त्रशिखा के बिना मन्त्र-सिद्धि नहीं हो पाती—
“तमः पूर्णे गृहे यद्वन्न किञ्चित् प्रतिभासते ।
शिखाहीनास्तथा मन्त्रा न सिध्यन्ति कदाचन ॥”
करोड़ों वर्षों तक भी साधना क्यों न की जाय किन्तु मन्त्रशिखा के बिना
मन्त्र-सिद्धि संभव नहीं है—'विना येन न सिद्धिः स्याद् वर्षकोटिशतैरपि ।'¹
२५. अशौच-भङ्ग—
मन्त्रसिद्धि हेतु अशौच-भङ्ग भी आवश्यक है । १. जप के आदि में 'जात
सूतक' एवं २. जप के अन्त में 'मृतसूतक' होता है सूतक संवलित मन्त्र सिद्ध
नहीं होता । अतः मन्त्र के आदि (जप के आदि में) एवं जप के अन्त में
सात-सात बार ब्रह्मबीज (प्रणव) का जप कर लेने से सूतक मिट जाता है ।²
२६. मन्त्रों का उदय-अस्त-लय—
आधार में 'उदय', हृदय में 'लय' एवं ब्रह्मरंध्र में 'विश्राम' । “आधारे उदयो
देवि! लयो हृदय उच्यते । विश्रामं ब्रह्मरंध्रे तु त्रिलक्षं परिकीर्तितम् ॥” 'उदये संगमे
शान्तौ त्रिलक्षो जप उच्यते ॥ (२९।८३ तन्त्रालोक) यहाँ मन्त्र-जप के प्रसङ्ग में
मन्त्र की तीन अवस्थाएँ बताई गई हैं । 'उदये इति प्राणशक्त्युदयस्थाने जन्माधारे ।
सङ्गमे इति नानानाडि संभेदभाजि हृदये । शान्ताविति प्राणनिरोधाय युगपद्-
गाढावधानात्मक इत्यर्थः ॥” (विवेक) आधारे उदयो देवि लयो हृदय उच्यते ।
विश्रामं ब्रह्मरंध्रे तु त्रिलक्षं परिकीर्तितम् ॥ श्रीममूलविद्या के वाग्भवबीज का उदय
मूलाधार में, मूलाधारादिब्रह्मरंध्रान्त व्याप्ति, जिह्वाग्र में विश्रान्ति ॥ ('अर्थरत्नावली')
कामराजबीज का उदय मूलाधार में, भ्रूमध्यान्त में व्याप्ति एवं ब्रह्मरंध्र में विश्रान्ति ॥
('अर्थरत्नावली') ।
२७. मन्त्रों की शिवशक्त्यात्मकता—
नेत्रतन्त्र में मन्त्रों को वर्ण-समष्टि मात्र न मानकर उन्हें शिव एवं शक्ति का
अपर पर्याय घोषित किया गया है—“यतेषां सर्ववेदित्वं सर्वशक्तित्वमेव च ।
तच्छिवत्वं समाख्यातं शक्तित्वं सर्वकर्तृत्ता । सर्वानुग्रहकर्तृत्वं सर्वत्रफलदायकम् ।
आत्मत्वं तत्स्वरूपं तु त्रिविधं साधनं स्मृतम् । मन्त्रोध्यानं तथा मुद्रा............. ॥”
('नेत्रतन्त्र' २१।७८-८०)
'मन्त्र' वाचक है और 'देवता' वाच्य है । वाचक एवं वाच्य में अभेद है ।
वाच्य-वाचक में अभेद होने के कारण मन्त्र एवं देवता में भी अभेद है ।³
२८. मन्त्र-चैतन्य एवं उनकी अन्य पद्धतियाँ—
१-२. शाक्तानन्द तरंगिणी ३. यामल