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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 530 में से

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पृष्ठ 74

६४ वरिवस्यारहस्ये
साक्षात्कृत होता है वही मन्त्र का अर्थ है—ध्यानेन परमेशानि यद्रूपं समुपस्थितम्।
तदेव परमेशानि! मन्त्रार्थविद्धि पार्वति ॥'१
मन्त्रार्थ, मन्त्रचैतन्य एवं योनिमुद्रा को जो नहीं जानता वह सौ करोड़ जप
करने पर भी सिद्धि नहीं प्राप्त कर सकता—'मन्त्रार्थं मन्त्रचैतन्य योनिमुद्रां न वेत्ति
यः । शतकोटिजपेनापि तस्य सिद्धिर्न जायते ॥'२
२३. योनिमुद्रा—
मन्त्र-साधना में सिद्धि पाने हेतु योनिमुद्रा का आत्मीकरण भी आवश्यक है।
इसकी प्रक्रिया निम्नानुसार है। मन्त्रोपासक पूर्वाभिमुखी या उत्तराभिमुखी बैठे ।।
उसके बाद चतुर्दलात्मक आधार पद्म, षड्दलात्मक स्वाधिष्ठान, (नाभि में)
दशदलात्मक मणिपूरक, हृदय में द्वादशदलात्मक अनाहत पद्म, कण्ठ में षोडश-
दलात्मक विशुद्धाख्य पद्म, भ्रूमध्य में द्विदलात्मक आज्ञापद्म एवं महापथ ब्रह्मरंध्र में
सहस्रदल पद्म का प्राणायाम के साथ ध्यान करे। आधार कमल में कन्द के मध्य
में रमणीय त्रिकोण है। त्रिकोण में रमणीय कामबीज स्थित है। वहाँ कामबीज से
उत्पन्त स्वायंभूलिङ्ग स्थित है। उसके ऊपर हंसाश्रित 'चित्कला' है। यहाँ स्वयंभू-
लिङ्ग से परिवेष्टित कुण्डलिनी का ध्यान करना चाहिए । वह कुण्डली चित्कला से
मण्डित है । आधारादिक समस्त षड् पद्द्मों का भेदन करके वह कुण्डलिनी हंस के
साथ ब्रह्मरंध्र में प्रवेश करे—ऐसी साधना की जाय । वह सदाशिव के साथ
क्षणमात्र रमण करते ही अमृत का क्षरण करती है। वह अमृत लाक्षा रसवत है।
उस अमृत से परदेवता का तर्पण करना चाहिए । इस अमृत से षट्चक्रों के
समस्त देवता तृप्त हो जाते हैं। उसी आरोहण मार्ग से उनका अवरोहण कराकर
मूलाधार लाना चाहिए। उसके बाद अक्षमाला का ध्यान करना चाहिए । ब्रह्मनाड़ी
में विसतन्तुस्वरूपा चित्रिणी नाड़ी स्थित है । उस नाड़ी के द्वारा मध्य भाग में
अनुलोम विलोम से मन्त्र-वर्णों द्वारा अक्षमाला ग्रथित की गई है। इस माला के
मनके वर्ण हैं। यह माला समस्त मन्त्रों की प्रकाशिका है। चरम वर्ण को मेरु
मानकर उसका लङ्घन नहीं करना चाहिए। वर्णों का बिन्दु के साथ उच्चारण करके
फिर साधक को मन्त्र का जप करना चाहिए । अकार से लकारान्त क्रम अनुलोम
है और लकार से प्रारंभ करके श्रीकण्ठान्त मन्त्र जप विलोम है। वर्गों के आठ
वर्णों द्वारा आठ बार जप करना चाहिए । अ-क-च-ट-त-प-य-श ही अष्टवर्ग है।
इनके द्वारा १०८ मूलमन्त्र का जप करना चाहिए । यही 'योनिमुद्रा' है ।३
२४. मन्त्रशिखा—
यह वह क्रिया है जिससे विद्या शीघ्र ही प्रसन्न हो जाती है। मूल कन्द में
भुजगाकाररूपिणी देवी है। उसक भ्रमावर्तवात ही प्राणवायु है। वह झिल्ली के
समान अव्यक्त एवं मधुर कूजन करती हुई ऊपर उठकर ब्रह्मरंध्र मार्ग से अपने घर
जाती है। उसके इस यातायात क्रम में साधक को अपना मनोलय करना चाहिए।
१. भूतशुद्धि २-३. शाक्तानन्द तरंगिणी