वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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करके यह विद्या तृतीयकूट द्वारा ब्रह्म एवं जीव का तादात्म्य स्थिर करती है । स
क ल पद जीव का वाचक है जिसकी जाग्रत् स्वप्न एवं सुषुप्ति नामक तीन कलाएँ
हैं । शक्ति ही बीज का वाचक है । उक्त दोनों में समानाधिकरण्य होने के कारण
उनके द्वारा लक्षित शुद्ध वस्तुएँ अभिन्न हैं ।)—तृतीयकूट के 'स क ल' पदों का
अभिप्राय है—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' । इस प्रकार जीव एवं ब्रह्म के स्वरूप का
लाक्षणिक वाक्यों द्वारा वर्णन करके उनका अभेद स्थिर किया गया है । यही है—
'महावाक्यार्थ' ।।१ भास्कराचार्य के शब्दों में अर्थ प्रकार निम्न हैं—'अथातः पूर्ण
गायत्र्याः प्रतिपाद्योऽर्थ आदिमः । भावार्थः संप्रदायार्थो निगर्भार्थस्तुरीयकः । कौलिकार्थो
रहस्यार्थो महातत्त्वार्थ एव च । नामार्थः शब्दरूपार्थश्चार्थों नामैकदेशगः । शाक्तार्थः
सामरस्यार्थः समस्तसगुणार्थकौ । महावाक्यार्थ इत्यार्थाः पञ्चदश्याः स्वसंमिताः ।।'
२१. मन्त्र-चैतन्य—
मन्त्रों का चैतन्यीकरण आवश्यक है क्योंकि उसके बिना मन्त्र शववत रहते हैं ।
चेतना के जिस धरातल से मन्त्र उठेगा उसी धरातल के अनुसार सिद्धि भी देगा ।
मन्त्रभूमि तो मध्यमावाक् एवं ऋषित्व की भूमि पश्यन्तीवाक् है । वैखरीवाक् में
चेतनांश प्रसुप्त है । मध्यमा, पश्यन्ती एवं परा में क्रमशः जाग्रत, अतिजाग्रत एवं
महाजाग्रत है । बिना मन्त्र-चैतन्य के मन्त्र अपनी शक्तिमत्ता व्यक्त नहीं कर पाता—
“चैतन्यरहितं मन्त्र यो जपेत् स च पापकृत ।
मन्त्राश्चैतन्यसहिताः सर्वसिद्धिकराः स्मृताः ॥' '२
स्थानस्थमन्त्र वरप्रदायक, ध्यानस्थमन्त्र फलप्रद, ध्यान एवं स्थान विनिर्मुक्तमन्त्र
सिद्ध होने पर भी शत्रु हैं ।३ मन्त्र-सिद्धि के स्थानों में मन्त्र में चैतन्य का आधान
रहता है ।
शाक्तानन्दतरंगिणी'-प्रोक्त मन्त्र-चैतन्य-प्रक्रिया—सहस्रार शिवपुर है । वहाँ
रमणीय कल्पवृक्ष स्थित हैं । वेद ही वृक्ष हैं और उनमें वेदों की चार संख्या ही
उनकी चार शाखाएँ हैं । यह वृक्ष नित्य पुष्पों एवं फलों से लदा रहता है ।
कल्पवृक्ष के नीचे रत्नवेदिका है । उसके ऊपर मनोहर पर्यङ्क हैं । यह स्वर्णमालाओं
एवं पुष्पमालाओं से अलंकृत है । उसके ऊपर कुण्डलिनी-संयुक्त महादेव विराजमान
हैं । इस प्रकार ध्यान करके मन्त्र-जप करना चाहिए । यहाँ आनन्दाश्रु, रोमाञ्च,
देहावेश, गदगदोक्ति अकस्मात् उत्पन्न हो जाती है । यहाँ चैतन्योपेत मन्त्र का एक
बार भी किया गया जप सौ, हजार, लाख या करोड़ जाप के समान फल देता
है । यही मन्त्रचैतन्य का स्वरूप है ।४
२२. मन्त्रार्थ—
'बीज' से देवता का शरीर उत्पन्न होता है—“देवतायाः शरीरं तु
बीजादुत्पद्यतेध्रुवम् ।।''५ 'भूतशुद्धि' में कहा गया है कि ध्यान के द्वारा जो स्वरूप
१. वरिवस्यारहस्यम् २-५. शाक्तानन्द तरंगिणी
५ वरि. भू.