वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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२. 'भावार्थ'—देवी, मन्त्र एवं जगत् में अभेद का प्रतिपादन ।
३. 'संप्रदायार्थ'—(कार्यकारण-जन्यजनक वाच्यवाचकवत्) ब्रह्म एवं जगत् तथा
जगत् एवं विद्या में अभेदानुसंधान ।।
४. निगर्भार्थ—परमशिव में निष्कलता (एकात्मता, अन्य पदार्थों का अभाव),
अपने दीक्षा-गुरु एवं परमशिव में अभेद तथा उस गुरु की कृपा के कारण अपने
एवं उस परमशिव में अभेद-दर्शन करना ही 'निगर्भार्थ है ।'१
५. 'कौलिकार्थ'—देवी, विद्या, श्रीचक्र एवं अन्यचक्र, स्वगुरु एवं स्वयं—
अर्थात् इन पाँचों में भेदाभाव का अनुसंधान ही 'कौलिकार्थ' है ।२
६. 'रहस्यार्थ'—कुण्डलिनी देवी पञ्चदशीविद्या एवं देवी से अभिन्न है, इनसे
अपने को अभिन्न देखना ही श्रीविद्या का 'रहस्यार्थ' है ।
७. 'महातत्त्वार्थ'—महत्तम, सूक्ष्मतम, व्योमोपरिस्थित, विश्वाभिन्न चिदानन्द-
स्वरूप परब्रह्म में अपने आपको को, अभेद-प्राप्त्यर्थ, लीन करना महातत्त्वार्थ है ।३
८-९. 'नामार्थ'-'शब्दरूपार्थ'—यह विद्या स्वयं अपने घटक अक्षरों द्वारा
व्यक्त अर्थ से अभिन्न है । उसका स्वरूप उसका प्रत्येक अक्षर है । श्रीविद्या का
यही 'नामार्थ' एवं 'शब्दरूपार्थ' है ।४
१०. 'नामैकदेशार्थ'—भगवती के एक देश (अंश) के ग्रहण द्वारा समस्त
नाम ग्रहण का बोध होता है । समस्त नाम का अर्थ नाम के एकांश का अर्थ है।
कल्याणी, एकाक्षरी, ईशित्री, ललिता आदि देवी के तीन सौ नामों का तात्पर्य मन्त्र
के आदि अक्षरों द्वारा व्यक्त होता है ।
११. 'शाक्तार्थ'—प्रत्येक अक्षर में शक्ति है एवं अक्षरों तथा वामा, इच्छा
एवं अन्य शक्तियों में अभेद है—यही है 'शाक्तार्थ' ।।५
१२. 'सामरस्यार्थ'—क एवं ह तथा ल एवं स का अर्थ है 'शक्ति' ।
हल्लेखा (ह्रीं) का अर्थ है—'शिवशक्ति का सामरस्यरूप परब्रह्म । तीनों कूटों में से
प्रत्येक का अर्थ है—'शिव एवं शक्ति के सामरस्य के कारण ब्रह्म ही शिव एवं
शक्ति दोनों ही हैं ।' यही विद्या का 'सामरस्यार्थ' है ।६
१३. 'समस्तार्थ'—अनेक पदों एवं गुणों का समास एवं समस्त पुरुषार्थों के
साधन का संक्षिप्त सार कथन ही 'समस्तार्थ' है ।७
१४. 'सगुणार्थ'—समस्त कलाओं से युक्त ब्रह्म स क ल है—यह तृतीय
कूट का अर्थ है । समस्त गुणगण-कथन के द्वारा 'सगुणार्थ' प्रतिपादित होता है ।८
१५. 'महावाक्यार्थ'—('ह' एवं 'स' आनन्द हैं, 'क' सत्य है, 'ह' अनन्त
है, 'ल' ज्ञान है । इस प्रकार तटस्थ एवं स्वरूप लक्षणों द्वारा ब्रह्म का निर्णय
१-८. वरिवस्यारहस्यम्