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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 475, कुल 530 में से

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पृष्ठ 475

द्वितीयोऽंशः ३७३
अत्यल्पमिदं कथितं यत् सर्वं खल्विदं ब्रह्म ।
इत्येवं बोधयितुं सकलपदं वा तृतीयकूटगतम् ॥ १४६ ॥
एवमवान्तरवाक्यैर्जीवब्रह्मस्वरूपमभिधाय ।
तद्भेदो वर्णित इत्येष महापूर्ववाक्यार्थः ॥ १४७ ॥
(पंचदशी मंत्रगत 'ह स क ह ल' के अर्थ का विवेचन)
(पंचदशी मंत्रगत) 'ह' एवं 'स' (वर्ण) आनन्द, 'क' सत्य, 'ह' अनन्त एवं
'ल' ज्ञान (के वाचक) हैं । इस प्रकार (ब्रह्म के) तटस्थ एवं स्वरूप दो लक्षणों के
द्वारा ब्रह्म का निर्णय करके... ॥ १४३ ॥
(तृतीयकूट द्वारा जीवब्रह्मैक्य की स्थापना का प्रतिपादन)
तृतीयकूट (शक्तिकूट) द्वारा ब्रह्म एवं जीव-समूह में अभिन्नता कही गई है ।
जागृति, स्वप्न एवं सुषुप्ति इन तीन कलाओं से युक्त होने के कारण ॥ १४४ ॥
(मन्त्रगत 'स क ल' पद का अर्थ)
पंचदशीमंत्रगत 'स' 'क' 'ल' (वर्णों की समष्टि) जीव का वाचक है ।
शक्ति-बीज ('ह्रीं') ब्रह्म का वाचक है । (उन दोनों में) सामानाधिकरण्य होने के
कारण उनके द्वारा सङ्केतित शुद्ध वस्तुएँ अभिन्न हैं ॥ १४५ ॥
('स' 'क' 'ल'-मंत्राक्षर का अर्थ)
यहाँ तक अत्यन्त कम कहा गया है । तृतीयकूट के 'स' 'क' एवं 'ल'
वर्ण, 'निश्चय ही यह सब ब्रह्म ही है—इस अर्थ को ही बोधित करने के लिए
प्रयुक्त किए गए हैं ॥ १४६ ॥
(मन्त्रगत महावाक्यार्थ का स्वरूप)
इस प्रकार आन्तर वाक्यों द्वारा जीव एवं ब्रह्म के स्वरूप पर प्रकाश डालकर
उनमें (जीव एवं ब्रह्म में) अभिन्नता (अभेदात्मकता) का वर्णन किया गया है और
यही है महावाक्यार्थ ॥ १४७ ॥

  • प्रकाश *
    'सखा कश्च बुधैः प्रोक्तः' इति कोशात् ककारः सखिवाचकः । सखित्व-
    माप्तत्वम् । तच्च यथार्थवक्तृत्वमिति शक्यसंबन्धेन प्रकृते सत्यमेव विवक्षितम् । एवं
    हकारस्य व्योमबीजत्वेन व्योम्नो ऽनन्तत्वादनन्तमित्यर्थः । प्रत्यक्षज्ञानजनकलोचनवाचि-
    लकारस्य ज्ञानमर्थः ।
    'तत्त्वमसि' इति महावाक्ये तत्पदार्थत्वंपदार्थयोरेकविभक्तिमत्त्वरूपसामानाधि-
    करण्यादभेदो बोध्यते । स च वाच्यार्थयोरसंभवाज्जहदजहल्लक्षणया लक्ष्यपदार्थयोरिति
    स्थितिः । तत्र तत्पदस्य वाच्यार्थः सृष्ट्यादिकृत्यपञ्चकजनकः । स च 'यतो वा इमानि
    भूतानि जायन्ते' इत्यादिना श्रुतावुक्तः । लक्ष्यार्थस्तु कृत्यातीतं निर्विशेषं ब्रह्म । तदपि