वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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३७२ वरिवस्यारहस्ये
ईकार ईश्वर का वाचक है तथा उकार सदाशिव का वाचक है । लक्षणा वृत्ति
से इन दोनों (वर्णों) के द्वारा उन (देवताओं) में (क्रमशः) तिरोधान एवं अनुग्रह
करने की क्षमता होना द्योतित किया गया है (कहा गया है।) ॥ १४२ ॥
- प्रकाश *
ईकारस्य नामैकदेशन्यायेनेश्वरबोधकत्वम् । 'डो महेशः समाख्यातः' इति वचने
ऽपि प्रकृते सदाशिव एवानुग्रहकर्ता विवक्षितः । एतेन 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते'
इत्यादिश्रुतावुक्तं ब्रह्मणस्तटस्थलक्षणमुक्तं भवति ॥ १४१-१४२ ॥ - सरोजिनी *
ककार = ब्रह्मा । एकार = विष्णु । अकार = शिव ॥ त्रिदेवों के लाक्षणिक
कारकत्व—ब्रह्मा = सृष्टि । विष्णु = स्थिति । शिव = संहार ॥
“अः इति ब्रह्म तत्रागतमहमिति” (ऐ०उ०)—“अः ही ब्रह्म है तत्रागतम् इस
विग्रह के अनुसार 'अहं' रूप निष्पन्न होता है ।”
'ई' का अर्थ—नामैकदेशन्याय के अनुसार 'ई' का अर्थ है—'ईश्वर' ।'
'डो महेशः समाख्यातः' के प्रमाण के आधार पर 'ड' का अर्थ अनुग्रहकर्ता
सदाशिव स्वीकार किया गया है ।
'ई' = ईश्वर ॥ 'ड' = सदाशिव ॥
'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते' आदि कहकर ब्रह्म का लक्षण जो स्रष्टा,
पालक एवं संहारक कहा गया है वह उसका तटस्थ लक्षण है जबकि अनुग्रह
उसका मुख्य लक्षण होने के कारण 'ड' अनुग्रह करने वाले सदाशिव का वाचक
स्वीकार किया गया है ।
'ई' एवं 'ड' वर्ण = ईश्वर एवं सदाशिव की तिरोधान एवं अनुग्रह क्षमता के
प्रतीक या वाचक हैं ॥ १४१-१४२ ॥
अथ 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इत्युक्तं स्वरूपलक्षणं द्वितीयकूटेनाह—
हस आनन्दः सत्यं कं हमनन्तं च लं ज्ञानम् ।
इत्थं ब्रह्म तटस्थस्वरूपलक्षणयुगेन निर्णीय ॥ १४३ ॥
तदभेदं जीवगणे वक्ति तृतीयेन कूटेन ।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्याख्यकलात्रितयेन १साहित्यात् ॥ १४४ ॥
सकलपदं जीवपरं ब्रह्मपरं शक्तिबीजं स्यात् ।
सामानाधिकरण्यात् तल्लक्षितशुद्धयोरभेदार्थः ॥ १४५ ॥
१. सहित्वात्