वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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३५० वरिवस्यारहस्ये
एवं शक्ति कूट के द्वारा (कटि से) चरणों के अग्रभाग तक के विभिन्न शरीरावयवों
से निर्मित हुआ है—इसको प्रतिपादित किया जाना चाहिए ॥ ११४ ॥
- प्रकाश *
अत्र विद्यायां वाक्कूटेन, आ कण्ठात् कण्ठमभिव्याप्य, अर्थात् किरीट-
मारभ्यावयवशो विग्रहः प्रतिपाद्यः । कामराजकूटेन कण्ठाधःकटिपर्यन्तविग्रहः ।
शक्तिकूटेन कट्यधः पादाग्रान्तो देहः प्रतिपाद्य इत्यर्थः । अत एव वाच्यवाचकयोर-
भेदविवक्षयोक्तं सहस्रनामसु—
'श्रीमद्वाग्भवकूटैकस्वरूपमुखपङ्कजा ।
कण्ठाधःकटिपर्यन्तमध्यकूटस्वरूपिणी ॥
शक्तिकूटैकतापन्नकट्यधोभागधारिणी ।
मूलमन्त्रात्मिका मूलकूटत्रयकलेबरा ॥' इति ॥ ११४ ॥ - सरोजिनी *
भगवती के शरीर की व्याख्या—(भगवती का मंत्रात्मक कलेवर)—भगवती
त्रिपुरसुन्दरी का अपना दिव्य विग्रह 'वाक्', 'काम' एवं 'शक्तिकूट' द्वारा निर्मित
हुआ है जिसका स्वरूप इस प्रकार है—१. किरीट के शीर्ष भाग से गले तक के
शरीरावयव = 'वाक्तत्त्व' द्वारा निर्मित है । २. गले से कटि भाग तक के
शरीरावयव = 'कामतत्त्व' द्वारा एवं ३. कटि भाग से चरणों के अग्रभाग तक के
समस्त शरीरावयव = 'शक्तिकूट' द्वारा निर्मित हैं ।
(क) 'वाक्तत्त्व' = भगवती के गले तक के शरीराङ्ग ।
(ख) 'कामतत्त्व' = भगवती के गले से कटिभाग तक के शरीराङ्ग ।
(ग) 'शक्तिकूट' = भगवती के कटिभाग से चरणान्त समस्त शरीराङ्ग ।
वाक्तत्त्व ──
कामतत्त्व ───> पराभट्टारिका महात्रिपुरसुन्दरी का शरीर ॥
शक्तिकूट ──/
कहा भी गया है—“श्रीमद्वाग्भवकूटैकस्वरूपमुखपङ्कजा । कण्ठाधः कटिपर्यन्त-
मध्यकूटस्वरूपिणी । शक्तिकूटैकतापन्न कट्यधोभागधारिणी । मूलमंत्रात्मिका मूल-
कूटत्रय कलेवरा ॥”
१. “अत्र विद्यायां वाक्कूटेन आकण्ठात् कण्ठमभिव्याप्य अर्थात् किरीट-
मारभ्यावयवशों विग्रहः प्रतिपाद्यः ॥ २. कामराजकूटेन कण्ठाधः ॥ कटिपर्यन्त
विग्रहः । ३. शक्तिकूटेन कट्यधः पादत्तान्तो देहः प्रतिपाद्यः ॥”१ (कट्यधः
पादाग्रान्तो देहः प्रतिपाद्यः ॥)
१. भास्करराय—'प्रकाश'