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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 448, कुल 530 में से

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पृष्ठ 448

३४६ वरिवस्यारहस्ये
'परा' के धरातल पर उच्चारित किया जाय तो आग उत्पन्न हो जाएगी
क्योंकि इस धरातल पर 'शब्द' एवं 'अर्थ' पृथक्-पृथक् नहीं हैं प्रत्युत्
अभिन्न हैं ।
'तत्तद्वर्णार्थेयं'—तत् + तत् + वर्ण + अर्थ + इयं ।। तत् तत् वर्णों का
अर्थ है ५८ वर्ण, ३७ वर्ण, १५ वर्ण 'तत्तद्वर्ण शब्देन ककारादयोऽष्टपंचाश-
द्वर्णाः, सप्तत्रिंशद्वर्णाः, पंचदश वर्ण वा गृह्यन्ते ।।१ ये ककारादिक सभी वर्ण 'ब्रह्म'
के वाचक हैं—'तेषां च सर्वेषां ब्रह्मवाचकत्वेन ।।'२
'नामार्थ' त्रिविधात्मक है—१. ५८ वर्ण २. ३७ वर्ण ३. १५ वर्ण 'नामार्थ-
स्त्रिविधः संपद्यते अष्टपंचाशन्नामकः सप्तत्रिंशन्नामक, पंचाशान्तत्मकश्चेति'३ इन तीनों में
ककारादि वर्णों में अन्यतम तत्त्व ब्रह्म का वाचक है—'ककारादीनामन्यतमस्य ब्रह्म-
वाचकत्वात् ।।'४
आचार्य भास्करराय कहते हैं कि 'ककारादिस्वरूपत्वं नामतः शब्दाभिन्नत्वम्'
तथा च न स ककारस्यार्थः, शब्दस्वरूपे शक्त्यभावात्'' उनका अपना तर्क है कि
'घटमानय' (घड़ा लाओ) कहने पर घट के साथ आनयन क्रिया (घट लाने की
क्रिया) तो जुड़ी नहीं है इसलिए शब्द एवं अर्थ में अभेद नहीं है अन्यथा 'वह्नि'
(आग) शब्द के उच्चारण मात्र से मुख में जलन उत्पन्न हो जाती है किन्तु ऐसा
नहीं होता भर्तृहरि ने भी इसे संपुष्ट किया है—
“ग्राह्यत्वं ग्राहकत्वं च द्वेशक्ती तेजसो यथा ।
तथैव सर्वशब्दानामेते पृथगवस्थिते ॥”
तथापि शब्द एवं अर्थ में तादात्म्य शक्ति निहित रहती है । भास्कर मानते हैं
कि मंत्रार्थ 'ककारादिवर्णरूप' होते हैं । शब्दस्वरूप की ही अर्थत्वेनवर्णना
शब्दरूपार्थ है—‘‘शब्दस्वरूपस्यैवार्थत्वेन वर्णनाच्छब्दरूपार्थोऽयमिति व्यपदिश्यते ।।’’५
शब्द में अर्थगर्भता रहते हुए भी अर्थप्रसव नहीं हो जाता । 'पत्थर' (शब्द)
कहते ही पत्थर (पदार्थ) उत्पन्न नहीं हो जाता किन्तु चेतनवाणी के धरातल पर—
'गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति'—इस गुहास्थित वाक्त्रयी के धरातल पर पत्थर कहते
ही पत्थर उसी प्रकार पत्थर उत्पन्न हो जाएगा यथा—ऋषियों के 'सर्पोभव' कहने
पर इन्द्र सर्प हो गया । क्योंकि 'गिरा अर्थ जल-वीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न ।'
अथ नामैकदेशार्थमाह—
कल्याण्येकाक्षर्यवीशित्री चापि ललिता च ।
इत्थं नामत्रिशतीवाच्यो ऽर्थस्तत्तदक्षरस्यापि ॥ १११ ॥
नामैकदेशमात्रे नामग्रहणस्य लोकसिद्धत्वात् ।
नामोपस्थितिगम्यः प्रोक्तो नामैकदेशार्थः ॥ ११२ ॥
१-५. भास्करराय—'प्रकाश'