वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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कुत्स्ने' इति कोशोक्तेः । आमो ऽपक्वः, तद्भिन्नो नामः, नकारेणैवात्र समासो न
नञा । तेन 'नलोपो नञः' इत्यादेरनापत्तिः, नास्तिक इत्यादिवत् । परिपक्वता
विरसत्वाभाव इत्यर्थात् । 'तत्तद्वर्णस्वरूपेयम्' इत्यत्रापि पूर्ववत् पक्षत्रयम् । ननु—
ककारादिस्वरूपत्वं नामतः शब्दाभिन्नत्वम्; तथा च न स ककारस्यार्थः, शब्दस्वरूपे
शक्त्यभावात्; न हि 'घटमानय' इत्यादौ घटशब्दस्यानयनक्रियान्वयः; अत एव न
शब्दार्थयोरभेदपक्षो ऽपि युज्यते, वह्न्यादिशब्दोच्चारणे मुखदाहाद्यापत्तेश्चेति चेन्न;
शब्दस्य स्वस्वरूपे ऽपि शक्तेस्तन्त्रवार्तिकादावुक्तत्वात् । उक्तं च भर्तृहरिणा—
‘ग्राह्यत्वं ग्राहकत्वं च द्वे तेजसो यथा ।
यथैव सर्वशब्दानामेते पृथगवस्थिते ॥’
इति । अत एव 'शब्दार्थयोस्तादात्म्यमेव शक्तिः' इति शाब्दिकनव्या इत्यन्यत्र
विस्तरः । इत्थं च ककारादिवर्णरूपेत्यादिर्मन्त्रार्थः । अत्र शब्दस्वरूपस्यैवार्थत्वेन
वर्णनाच्छब्दरूपार्थोऽयमिति व्यपदिश्यते ॥ ११० ॥
- सरोजिनी *
आचार्य भास्करराय कहते हैं कि 'श्रीविद्या' एवं उसके अक्षरों में व्यक्त अर्थ
दोनों अभिन्नार्थक हैं । श्रीविद्या के शब्द एवं उनमें निहित अर्थ दोनों का स्वरूप
एक ही है । इस कथन में एक रहस्य छिपा है । रहस्य यह है कि—
१. यद्यपि 'वैखरीवाक्' के धरातल पर (वाणी की चैतन्यशून्यता के धरातल
पर) वाक्तत्त्व एवं अर्थ तत्त्व दोनों भिन्न-भिन्न हैं अतः यहाँ शब्द अलग है
और अर्थ अलग हैं अतः इस धरातल पर "तत्तद्वर्णार्थेयं
तत्तद्वर्णस्वरूपेयम्" का कथन समीचीन नहीं है किन्तु
२. 'मध्यमा' 'पश्यन्ती' एवं 'परावाक्' के धरातल पर शब्द एवं अर्थ दोनों
अभिन्न हैं—जो शब्द है वही अर्थ है और जो अर्थ है वही अर्थ है,
इसीलिए कालिदास ने भी कहा था—'वागर्थामिव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।'
इस धरातल पर मयूराण्डरसन्याय की भाँति शब्द में अर्थ एवं अर्थ में
शब्द निमज्जित रहते हैं ।
३. 'शब्दब्रह्म' में समस्त शब्द एवं समस्त अर्थ अभिन्न रूप से वर्तमान रहते
हैं । 'अर्थ' शब्द का 'परिणाम' नहीं 'विवर्त' है 'शब्दब्रह्म' स्वयं विवर्तभाव
से जगत् बन जाता है—'शब्द' (शब्दब्रह्म) 'अर्थ' (पदार्थमय जगत्) के
रूप में रूपान्तरित हो जाता है । जगत् बन जाता है । 'शब्द' शब्दब्रह्म
है और अर्थ 'जगत्' है अतः जगत् 'शब्द' का विवर्त मात्र है—
“अनादिनिधनं ब्रह्म शब्द तत्त्वं यदक्षरम् ।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥”
४. यदि 'रं' मातृका का वैखरी के धरातल पर उच्चारण किया जाय तो कोई
विशेष परिणाम दृष्टिगोचर नहीं होगा किन्तु यदि उसे 'मध्यमा'-'पश्यन्ती'