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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 444, कुल 530 में से

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पृष्ठ 444

३४२ वरिवस्यारहस्ये
'या तु स्फुटानां वर्णानामुत्पत्तौ कारणं भवेत् ।
सा स्थूला वैखरी यस्याः कार्यं वाक्यादिभूयसा ॥'१
'विखर' का अर्थ है शरीरोत्पन्न । जो शरीर एवं इन्द्रियों को क्रिया करने में
प्रवृत्त करती हुई स्वयमेव शरीर में स्फुटतया व्यक्त होती है वही वैखरी है । 'विखरः
शरीरं तत्र भवा तत्पर्यंत चेष्टासम्पादिकेत्यर्थः ॥'२
कामकलाविलास के टीकाकार की दृष्टि में वैखरी का स्वरूप—
पुण्यानन्दाचार्य ने 'कामकलाविलास' की टीका में कहा है कि 'वैखरी' १.
अभिलापरूपिणी (वर्णात्मक शब्दस्वरूपा) २. पंचदशाक्षरमयी ३. सर्ववैदिकलौकिक
शब्दनात्मिका (लौकिक वैदिक शब्दों की आत्मभूता) ४. शक्तिरूपा—‘‘वैखरी नाम
अभिलापरूपिणी पंचदशाक्षरमयी सर्ववैदिक लौकिक शब्दनात्मिका शक्तिरित्युचते ॥’’
(पुण्यानन्दाचार्य टीका) यदि वाणी को वृक्ष माना जाय तो १. पराभूमि—बीजों के
अंकुरण की भूमि २. ‘‘पश्यन्ती’’—वल्लीगुच्छ ३. ‘मध्यमा’’—सौरभ ४.
‘वैखरी’—अक्षमाला ।। ‘सेतुबंध’ में भास्करराय ने कहा गया है कि क्रियाशक्ति जो
कि वैखरी का स्वरूप है ज्ञान की पुच्छ है ।
‘‘प्रपंचसार तंत्र’’ की टीका में पद्मपादाचार्य ने कहा है कि वैखरी शब्द का
वह स्तर है जो मुखपर्यन्त अभिव्यक्त एवं शब्द सामान्यात्मक है ‘‘अथ विराडरूपिणीं
बीजात्मिकां हृदयादास्यान्तं अभिव्यज्यमानां शब्दसामान्यात्मिका वैखरीमाह वक्त्र
इति।’’ 'विशेषेण खरत्वात् वैखरी' ।। 'सौभाग्यभास्कर' में कहा गया है कि वायु के
द्वारा कण्ठादिक स्थानों में अभिव्यज्यमान मकारादिवर्णरूप श्रोत्रग्रहणयोग्य स्पष्टतर
प्रकाशरूप बीजात्मक वाक् ही वैखरी है । 'ईश्वर प्रत्यभिज्ञा विमर्शिनी' में कहा गया
है कि प्राणों में स्फुटीभूत वाक् वैखरी है—
'परं प्रति जिज्ञापयिषुः प्राणे स्फुटीभूत वैखरी ॥'
'बिन्दु' 'नाद' एवं 'बीज' की त्रिपुरी में 'वैखरी' बीज है । विराट पुरुष एवं
वैखरी एकरूप हैं । 'परावाक्' रूप शब्दब्रह्म हृदय से मुखपर्यन्त यात्रा करता हुआ,
वायु के द्वारा कण्ठादिक उच्चारणस्थानों में अभिव्यक्त होकर अकारादिक वर्णरूप
ग्रहण करके श्रोत्र ग्राह्य होकर प्रकाशन के स्तर पर स्थूलभाव ग्रहण करने पर
'वैखरी' कहलाता है ।
क्रियाशक्ति का रूपान्तर ही वैखरीवाक् है—'क्रियाशक्तिस्तु रौद्रीयं
वैखरीविश्वविग्रहा ॥'३ प्रत्यावृत्ति क्रम द्वारा, क्रियाशक्ति एवं रौद्री में सामरस्य स्थापित
होने के अनन्तर वही शक्ति शृङ्गार की दक्षिण रेखा बनकर उज्ज्वल शृङ्गार (त्रिकोण)
के रूप में भासित हो उठती है । और यही विश्वविग्रहा, वाग्रूपप्रपंचमयी वाणी
'वैखरी' के नाम से अभिहित की जाती है । 'वैखरी विश्व विग्रहा वाग्रूपप्रपंचमय
वैखरीरूपा जाता ॥'४
१. तन्त्रालोक २. ई०प्र०वि० (अ०१; वि०५)
३. योगिनी हृदय ४. दीपिका