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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 443, कुल 530 में से

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पृष्ठ 443

द्वितीयोंऽशः ३४१
स्पष्टतर प्रकाशरूप स्थूलभाव धारण करता है । विराट पुरुष और स्थूल वैखरीवाक्
एक ही है ।
प्रकाशांशरूप रौद्री + विमर्शांश रूप क्रिया—“वैखरीवाक्” ॥ वैखरी =
क्रियाशक्ति ॥
'परावाक्' द्वारा स्वनिष्ठ स्फुरता का ईक्षण—विश्वोदय ॥
(नित्या षोडशिकार्णव) ॥
‘वक्त्रे वैखर्यर्थ रुरुदिषोरस्य जन्तोः सुषुणा ।
बद्धस्तस्माद्भवति पवनप्रेरितो वर्णसङ्घः ॥'१
वैखरीवाक्—'रौद्री' एवं क्रियाशक्ति के साम्य से जो बिन्दु प्रकट होता है
उसकी आख्या है—'वैखरीवाक्' ॥ श्रीशिवाग्रयोगीन्द्रज्ञान शिवाचार्य 'शैवपरिभाषा' में
वैखरीवाक् की इस प्रकार परिभाषा देते हैं—'प्राणवृत्त्याभिव्यक्ता श्रोत्रग्राह्यार्थविशेष
बोधनक्षमा सैवं वैखरी ॥' वैखरीवाक् का स्वरूप निम्नानुसार है—
“वैखरीश्रोत्रविषया स्थूलवर्णपरिग्रह ।
स्थानेष्वपि धृतौ वायौ प्रयोक्तुरूपकारिणी ॥”२
तात्विक धरातल पर वैखरीवाक् का सम्बंध 'विद्यातत्व' से है—योगीन्द्र ज्ञान
शिवाचार्य 'शैवपरिभाषा' में कहते हैं— “ईश्वरतत्व विकारो विद्यातत्वम् । इदमेव
वैखर्यख्याया वाग्वृत्तेरधिष्ठानम् ॥” अर्थात् ईश्वरतत्व का विकार 'विद्यातत्व' है और
यही वैखरी वाग्वृत्ति का अधिष्ठान है । करणभूत सप्तकोटिसंख्यक मंत्रों एवं
विद्याराज्ञी एवं उनके भुवनों का भी इसी से सम्बन्ध है—“तथा करणभूतानां
सप्तकोटि संख्यानां मंत्राणां विद्याराज्ञीनां च तनुभुवनासम्पादकम् ॥”३
तांत्रिक शब्दावली में कहा जाय तो कहा जायेगा कि प्रकाशांशात्मक रौद्री
शक्ति एवं विमर्शाशात्मक क्रियाशक्ति का संयोग ही वैखरीवाक् है । त्रिकोण का
सङ्घटन यहीं पूर्ण होता है इसीलिए वैखरी को भी समुज्ज्वल 'शृङ्गारवपु' की
आख्या प्रदान की गई है—“तत्संहति दशायां तु बैन्दवं रूपमास्थिता ।
गत्यावृत्तिक्रमेणैव शृङ्गारवपुरुज्ज्वला । क्रियाशक्तिस्तु रौद्रीयं वैखरी विश्वविग्रहा ॥”४
वैखरी को 'क्रियाशक्ति' 'रौद्रीशक्ति' आदि पदों से भी अभिहित किया गया है।
क्रियाशक्ति एवं वैखरी अभिन्न सम्बंध है । क्रियाशक्ति अपनी अस्फुटदशा में
बीजरूपात्मिका परमाकलावस्था में निहित रहती है किन्तु स्फुट रूप धारण करने पर
वही क्रियाशक्ति 'वैखरी' में भी विद्यमान रहती है । परमाशक्ति के ईक्षण-व्यापार में
इच्छा एवं ज्ञान के साथ क्रियाशक्ति भी सम्मिलित रहती है ।
जो स्फुट वर्णों की उत्पत्ति का कारण है वही है 'स्थूलवैखरी' ॥
१. प्रपञ्चसार तन्त्र २. पौ०बिन्दु०प० (२०।३)
३. शैवपरिभाषा ४. योगिनीहृदय