वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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त्याग कर देती है और प्राणवायु अपने आप सुषुम्ना में प्रवेश कर जाता है ।१ जो
योगी शक्ति को चलायमान कर लेता है वह भाग्यशील, सिद्ध एवं काल-जयी हो
जाता है । कुण्डली को चलाकर भस्त्रिका प्राणायाम करना चाहिए—‘कुण्डली’
चालयित्वा तु भस्त्रं कुर्याद्विशेषतः ।’ अपने शरीर में स्थित बहत्तर हजार नाड़ियों
के मल-शोधन एवं उनके प्रक्षालन का अमोघ उपाय मात्र यही कुण्डलिनीयोग
है२—‘द्वासप्ततिसहस्त्राणां नाड़ीनां मलशोधने । कुतः प्रक्षालनोपायः कुण्डल्यभ्यसना-
दृते ॥’’ मल को शक्ति (कुण्डलिनी) के मध्य एवं शक्ति को मन के मध्य लाकर
कुण्डली का उद्बोधन करना चाहिए—‘शक्ति मध्ये मनः कृत्वा शक्तिं मानसमध्य-
गाम’ क्योंकि इससे परमपद की प्राप्ति होती है—‘मनसा मन आलोक्य धारयेत्परमं
पदम् ॥’’३
इसके कुटिला, कुटिलोगी, कुण्डली, शक्ति आदि अनेक नाम हैं—कुटिलाङ्गी
कुण्डलिनी भुजङ्गीशक्तिरीश्वरी । कुण्डल्यसन्थती चैते शब्दाः पर्याय वाचकाः ॥४
रुद्रयामल.में इसके एक हजार नाम उल्लिखित है ।
कुण्डलिनी की स्थिति एवं उसका स्वस्वरूप—मूलाधार में स्थित स्वयंभूलिङ्ग
के ऊर्ध्व में कमल के सूक्ष्म तन्तु के समान अत्यन्त तनुकलेवरा जगन्मोहिनी,
ब्रह्मद्वार के मधुर मुख को अपने मुख से आच्छादित करती हुई, शङ्ख के
वेष्टनाकार के समान, नव्य विद्युन्माला के समान, सार्द्ध त्रिवलया, भुजङ्गी के समान
यह कुण्डलिनी स्वयंभूलिङ्ग के ऊपर सोई हुई, मतवाले भ्रमरों की पंक्ति की
मधुरध्वनि के समान कोमल काव्य-बंध एवं उनके भेदातिभेद क्रम से मधुर गुंजार
करती हुई, श्वासोच्छ्वासरूपी वायु से जीव को धारण करती हुई ‘कुलकुण्डलिनी’
उद्दीप्त तेजोमय त्रिवली के रूप में मूलाधार कमल की कर्णिका के गह्वर में विलास
करती है ।५ उस कुण्डलिनी में नादरूपा श्रीपरमेश्वरी परशक्ति शोभायमान है जो कि
सूक्ष्मातिसूक्ष्म, अतिकुशल एवं नित्यानंद ब्रह्म से क्रमशः क्षरित अमृतप्रवाह का
ग्रहण करती है । इसके प्रकाश से ब्रह्माण्ड से लेकर पिण्ड तक सकल जगत्
प्रकाशित है तथा इससे ज्ञान का उदय होता है ।६ मूलाधार चक्र के गह्वर में
विलास करने वाली, कोटि सूर्यों के समान प्रकाशवाली यह कुण्डलिनी अपना ध्यान
करने वाले योगी को वाणी का अधिपति एवं सर्वविद्या विनोदी बना देता है ।७
‘परबिन्दु’ के भिद्यमान होने पर अव्यक्तात्मा ‘ख’ आविर्भूत हुआ । उसे प्राप्त करके
देह के भीतर कुण्डलीरूप में वर्णों का उदय (गद्य-पद्य आदि भेदों में) हुआ ।८ यह
कुण्डलिनी शक्ति ‘सृष्टिरूपा’ (सृष्टिस्तु कुण्डलीख्याता) ‘सृष्टिस्थिति लयात्मिका’
‘विश्वातीता’ ज्ञान रूपा है ।९ वह झिल्ली की भाँति अव्यक्त एवं मधुर सङ्गीत के
साथ कूजन करती है ।१० कुण्डलिनी हंस (आत्मा, परमात्मा) को अपने में धारण
१-४. हठयोगप्रदीपिका ५-७. षट्चक्रनिरूपण
८. शारदातिलक
९. 'श्यामां सूक्ष्मां सृष्टिरूपां सृष्टिस्थिति लयात्मिकाम् विश्वातीतां ज्ञानरूपां ।!’’
१०. “झिल्लीवाऽव्यक्तमधुरकूजन्ती सततोत्थिता ॥”