सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 400

२९८ वरिवस्यारहस्ये
(श्रीचक्र की नक्षत्ररूपता)
तीन वृत्तों, तीन भूगृह-रेखाओं तथा चतुर्दश कोणों एवं अन्य सात चक्रों की
पृथक्-पृथक् गणना करने से इसकी नक्षत्ररूपता (सिद्ध होती) है ॥ ९३ ॥

  • प्रकाश *
    द्वयोः पद्मयोः कर्णिकावृत्ते द्वे, एकं बहिर्वृत्तमिति त्रयम् । धरणीत्रयं भूगृह-
    रेखास्तिस्रः । मन्वश्राणि चतुर्दश कोणाः । इतरैः, त्रैलोक्यमोहनसर्वसौभाग्य-
    दायकातिरिक्तैः । वृत्तत्रयमन्वश्रबहिर्दशारैरिति केचित् ॥ ९३ ॥
  • सरोजिनी *
    “एवं विश्वप्रकारा च चक्ररूपा महेश्वरी” । चूँकि देवी चक्ररूपा है अतः यदि
    श्रीचक्र नक्षत्ररूपात्मक है तो देवी भी नक्षत्ररूपा मानी जानी चाहिए । ‘योगिनीहृदय’
    में श्रीविद्या को नक्षत्ररूपिणी कहा गया है ।
    ‘हृल्लेखात्रयसंभूतैस्तिथिसंख्यैस्तथाक्षरैः ।
    अन्यद्वादशभिर्वर्णैरैषा नक्षत्ररूपिणी ॥’
    ‘श्रीचक्र’ भी नक्षत्ररूप है—
    १. ३ वृत्त २. ३ भूगृहरेखा ३. १४ कोण ४. ७ अन्य चक्र सभी को
    मिलाकर जो २७ संख्यायें होती है वह २७ संख्या वाले नक्षत्रों का प्रतीक है ।
    दो कर्णिकावृत्त, एक बहिर्वृत्त, धरणीत्रय (तीन भूगृहरेखायें), मन्वश्रादिक चौदह
    कोण, त्रैलोक्यमोहन, सर्वसौभाग्यदायक आदि चक्र को मिलाकर श्रीचक्र के २७
    अङ्ग हो जाते हैं अतः चक्र की नक्षत्ररूपता सिद्ध है ।१
    स्थितिसंहृतिचक्रे द्वे पद्मे द्वे वृत्तभूगृहे च द्वे ।
    एवं षड्भिर्योगाच्छ्रीचक्रं योगिनीरूपम् ॥ ९४ ॥
    (श्रीचक्र की योगिनीरूपात्मकता )
    स्थिति एवं संहार नामक दो चक्र, दो पद्म तथा दो अन्य वृत्त एवं भूगृह
    आदि छः के योग से यह ‘श्रीचक्र’ योगिनीरूप है ॥ ९४ ॥
  • प्रकाश *
    बिन्दुत्रिकोणवसुकोणाः संहृतिचक्रम्, दशारे द्वे चतुर्दशारं च स्थितिचक्रम्,
    अवशिष्टं सृष्टिचक्रमित्येतत् त्रिप्रकारकत्वं चक्रसङ्केते स्पष्टम् । पद्मे वसुदलषोडशदले ।
    वृत्तमेकं भूगृहत्वेनैकम् । अष्टभिः कोणैर्ब्राह्म्यादियोगिनीरूपत्वं वदतां त्वति-
    वैरूप्यम् ॥ ९४ ॥
    १. भास्करराय—‘प्रकाश’ (श्लोक ९२)