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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 399, कुल 530 में से

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प्रतिपादन किया है—
‘विद्यापि तादृगात्मा सूक्ष्मा सा त्रिपुरसुन्दरी देवी ।
विद्यावेद्यात्मकयोर त्यन्ताभेदमामन्त्यार्थः ॥१
नटनानन्दनाथ ‘चिद्वल्ली’ में कहते हैं—इतः परं विद्यादैवतयोरपि न
भेदलेशोऽपि वेद्यवेदकयोरिक्ति इति उक्तमेवार्थं दृढयितुं देवतावद्विद्याया अपि विश्वात्मक-
त्वात्तदुत्तीर्णत्वं व्यक्तमाह ।’’ अर्थात् विद्या (पंचदशी विद्या) एवं देवता (त्रिपुरसुन्दरी)
में रंचमात्र भी भेद नहीं है इसी तथ्य को दृढ़ीभूत करने की दृष्टि से ग्रंथकार ने
वेद्य-वेदक भाँति में अभिन्नता दिखाई है तथा इसके दृढ़ीकरण हेतु ग्रंथकार ने देवता
की भाँति विद्या को भी विश्वात्मक एवं विश्वोत्तीर्ण कहा है ।२
‘चिद्वल्ली’ की भाँति ‘चिदम्बरसंहिता’३ में भी कहा गया है—‘‘अहं
पंचाक्षरस्साक्षात् त्वं तु पंचदशाक्षरी’’ ‘चतुश्शती’ में भी कहा गया है—‘यस्य यस्य
पदार्थस्य या या शक्तिरुदाहृता । सा सा सर्व