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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 398, कुल 530 में से

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२९६ वरिवस्यारहस्ये
देवी को 'महातंत्रा' 'महामंत्रा' एवं 'महासना' के साथ 'महायंत्रा' भी कहा गया
है—'महातंत्रा महामंत्रा महायंत्रा महासना” भगवती सिद्धेश्वरी । सिद्धमाता के साथ ही
'सिद्धविद्या' (पंचदशी विद्या = पंचदशाक्षरी मंत्र) भी है— 'सिद्धेश्वरी सिद्धविद्या''।।
वे विमर्शरूपिणी एवं 'विद्या' भी है— 'विमर्शरूपिणी विद्या' वे आत्मविद्या, के साथ
ही साथ कामसेविता 'महाविद्या' एवं 'श्रीविद्या' भी है— 'आत्मविद्या महाविद्या श्रीविद्या
कामसेविता' वह त्रिकूटा 'षोडशाक्षरी विद्या' भी है— "श्रीषोडशाक्षरी विद्या त्रिकूटा
काम कोटिका” जो मंत्र स्त्रीदेवतात्मक होते हैं उन्हें 'विद्या' एवं जो पुरुषदेवतात्मक
होते हैं उन्हें 'मंत्र' कहा जाता है— 'स्त्रीदेवतास्तुविद्याः स्युर्मंत्रा पुंदेवतामता' —अतः
यहाँ देवी को जो 'विद्या' कहा गया है वह विद्या भी मंत्र का ही वाचक है ।
'तोडल तंत्र' में उन्हें— 'परमाविद्या' कहा गया है— 'या चाद्या परमाविद्या' भगवती
'मंत्ररूपिणी' है— “ज्ञातृज्ञानमयाकारमननान्मंत्ररूपिणी ।।'”¹ कूट मंत्र के भाग है अतः
देवी को 'कूटत्रयात्मिका' भी कहा गया है— "कूटत्रयात्मिका देवी समष्टि व्यष्टि
रूपिणीम् ।।'”² 'सूतसंहिता' में भी उन्हें 'विद्यारूपा' कहा गया है³— 'विद्यारूपा या
शिवा वेदवेद्या सत्यानन्दानन्त संवित्स्वरूपा'— 'स्कन्दपुराण' में उन्हें परमाविद्या कहा
गया है— "ईदृशी परमा विद्या शाङ्करी भवनाशिनी ।'”४
अथ चक्रराजे गणेशादित्वमाह—
रेखादलकोणगणैर्घटनाच्चक्रे गणेशत्वम् ।
त्रैलोक्यमोहनाद्यैर्नवभिश्चक्रैर्ग्रहत्वं च ॥ ९२ ॥
(श्रीचक्र की ग्रहरूपात्मकता)
रेखा-समूह, दल-समूह एवं कोण-समूह द्वारा घटित होने के कारण श्रीचक्र में
गणेशत्व एवं त्रैलोक्यमोहन आदि नौ चक्रों के द्वारा विरचित होने के कारण (श्रीचक्र
की) गहरूपता (सिद्ध होती) है ॥ ९२ ॥

  • प्रकाश *
    रेखाश्चतुरश्रास्तिस्रो वर्तुलास्तिस्रः । दलानि चतुर्विंशतिः । कोणाः पञ्च-
    चत्वारिंशत् । त्रैलोक्येति । सर्वानन्दमयान्तैरिति शेषः । रेखाभिस्तिसृभिरकथादिमयीभि-
    र्मध्यत्रिकोणगाभिर्गणेशत्वं वदतां चक्रैकदेशे तदापत्त्या वैरूप्यं दोषः ॥ ९२ ॥
  • सरोजिनी *
    'कामकला विलास' में कहा गया है—'पंचदशाक्षरी विद्या भी उसी प्रकार
    (त्रिपुरावत, चिदानन्दस्वरूपिणी, विश्वात्मिका एवं विश्वोत्तीर्ण) है । वह परिच्छेदशून्य
    (सूक्ष्म) त्रिपुरासुन्दरी देवी है । तत्त्वविद्योगियों ने पंचदशीविद्या एवं वेद्य
    (महात्रिपुरसुन्दरी देवी) दोनों में शाश्वतिक साम्य सामरस्य (अभेदात्मकता) का
    १-२. योगिनीहृदय 'दीपिका' ३. सूत संहिता
    ४. स्कन्दपुराण