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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 397, कुल 530 में से

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पृष्ठ 397

द्वितीयोंऽशः २९५
मंत्र श्रीविद्या में स्थित है और विद्या स्वयं देवी है—(क) तथा मंत्राः समस्ताश्च
विद्यायामत्र संस्थितः ।१ (ख) विद्या समस्तास्तव देवि भेदाः ॥
७. 'चक्र' मंत्रात्मक है और चक्र देवीरूप है—देवी का शरीर है
“इत्थं मंत्रात्मकं चक्रं देवतायाः परं वपुः ॥”२
जहाँ तक देवी का गणेशत्व, ग्रहरूपत्व, नक्षत्ररूपत्व, योगिनीरूपत्व है वह
सिद्ध ही है अतः उससे अभिन्न विद्या भी गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी आदि के
साथ अभिन्न है । देवी के इन स्वरूपों की पुष्टि इस प्रकार है—१. गणेशत्वं
महादेव्याः २. ग्रहरूपा च सा देवी ३. नक्षत्रविग्रहा जाता ४. योगिनी त्वमथोच्यते ॥३
इसी भाँति विद्या भी गणेशरूपा, परावाक्रूपा, ग्रहात्मिका, नक्षत्ररूपा, राशिरूपा
है—१. गणेशोऽभून्महाविद्या २. परावागादिवाङ्मयी ३. बीजबिन्दुध्वनीनां च त्रिकूटेषु
ग्रहात्मिका ४. अन्यैर्द्वादशभिर्वर्णैरिक्षा नक्षत्ररूपिणी ॥ ५. योगिनीत्वं च विद्याया
राशित्वं चान्त्यवर्जितैः ॥
आचार्य अमृतानन्द ग्रहरूपता की पुष्टि करते हुए कहते हैं—
(क) त्रिषु कूटेषु नवत्वमापन्ना विद्या ग्रहात्मिका भवति ।४ (ख) नक्षत्ररूपता—
हकार रेफेकार बिन्दुनादाः प्रतिहल्लेखां पंचेति तिथिसंख्यैः पंचदशसंख्यैः । अन्यैः
सव्यञ्जनरूपैर्वर्णैर्द्वादशभिर्मिलित्वा सप्तविंशत्या नक्षत्ररूपैषा विद्या ॥”५
'ललितासहस्रनाम' में भगवती राजराजेश्वरी त्रिपुरा को 'सर्वमंत्रस्वरूपिणी' कहा
गया है—'सर्वशक्तिमयी सर्वमङ्गला सद्गतिप्रिया । सर्वेशी सर्वमयी सर्वमंत्रस्वरूपिणी ।६
समस्त सात करोड़ मंत्र भगवती के स्वस्वरूप हैं—'सर्वे सप्तकोटिसंख्या मंत्राः
स्वरूपमस्याः ॥ श्रूयते च 'सुन्दरीतापनीये'—'पूर्वोत्ताराभ्यां विद्याया अनेकाः
परिक्लृप्ता' 'विद्या समस्तास्तव देवि भेदाः' कहकर भी इसी तथ्य की पुष्टि की गई
है । गौड़पाद ने भी “विद्याः या पूर्वोत्तराभ्यामनेका जाता' आदि सात सूत्रों द्वारा
भगवती त्रिपुरा के सर्वमंत्रात्मकत्व का प्रतिपादन किया है ।७ भगवती को
'मूलमंत्रात्मिका' भी कहा गया है १. 'मूलमंत्रात्मिका मूल कूटत्रय कलेवरा' । वह
पंचदशी मंत्र के 'वाग्भव' 'कामराज' एवं 'शक्ति' नामक कूटों का विग्रह है । यह
भी कहा गया है कि भगवती 'पंचदशी' नामक मंत्र की शरीरं के रूप में धारण
करती हैं—
१. कण्ठ से कटिपर्यन्त ┐ 'कण्ठाधः कटिपर्यन्तमध्यकूट स्वरूपिणी ।
२. कटि से नीचे का भाग ┤ शक्तिकूटैकतापन्न कट्यधोभाग धारिणी ॥'
३. मुख भाग ┘ 'श्रीमद्वाग्भवकूटैकस्वरूपमुख पङ्कजा ॥'
१-५. योगिनीहृदय 'दीपिका' ६. ललितासहस्रनाम (श्लोक १०३)
७. भासुरानन्दनाथ—'सौभाग्यभास्कर' (श्लोक १०३)

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