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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 396, कुल 530 में से

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पृष्ठ 396

२९४ वरिवस्यारहस्ये
एवं गणेशादिषट्कत्वस्य विद्यायां देव्यभेदसाधकत्वे स्थिते ऽपि विद्यायां
देवीरूपान्तरत्वस्य वचनबलादेव सिद्धत्वेन रामकृष्णादिवदभेदस्यापि सिद्धत्वेनाभेदेनैव
हेतुना षट्कत्वं साधयति—
देव्या रूपान्तरत्वेन विद्यायास्तदभेदतः ।
गणेशग्रहनक्षत्रयोगिनीराशिपीठता ॥ ९१ ॥
(पंचदशी विद्या एवं देवी में अभेदात्मकता)
देवी का रूपान्तर होने के कारण विद्या का उससे (देवी के साथ) अभेद होने
से उसका गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी एवं राशि रूप युक्ति-सङ्गत है ॥ ९१ ॥

  • सरोजिनी *
    “विद्या समस्तास्तव देवि! भेदाः ।।” कहकर श्रीविद्या एवं देवी दोनों में
    अभिन्नता स्थापित की गई है ।
    उपर्युक्त श्लोक में निम्न अभिन्नताओं को रेखांकित किया गया है— १.
    श्रीविद्या एवं देवी में अभिन्नता २. श्रीविद्या का गणेशरूपत्व, ग्रहत्व, नक्षत्रत्व,
    योगिनीरूपत्व ,एवं राशिरूपत्व स्वसिद्ध है ।
    श्रीविद्या एवं देवी में अभेद—इस संदर्भ में निम्न तर्क उक्त बिन्दु को संपुष्ट
    करते हैं—१. समस्त ‘मन्त्र’ मातृकाओं से से उद्भूत होते हैं अतः मातृकात्मक हैं ।
    मातृकाओं का मूलकेन्द्र ‘परावाक्’ है । ‘परमाकला’ रूपादेवी स्वयं ‘परावाक्’ है—
    “आत्मनः स्फुरणं पश्येद्यदा सा परमा कला । अम्बिकारूपमापन्ना परावाक्’
    समुदीरिता ॥”
    २. परमेश्वरी कुण्डली (देवी) मंत्रों के प्राणस्वरूप मातृकाओं का स्वस्वरूप
    है—‘‘इच्छाज्ञानक्रियारूपा कुण्डली परमेश्वरीम् । प्रसुप्त भुजगाकारां मातृकारूपिणीं
    शिवाम् ।।’’१
    ३. समस्त मंत्र शिव-शक्ति से समुत्पन्न हैं—‘‘शिवशक्ति समायोज्जनितो
    मंत्रराजकः ।।’’२
    ४. पराशक्ति मंत्ररूपिणी एवं मातृकारूपा दोनों है—‘‘ज्ञातृज्ञानमया
    कारमननान्मंत्ररूपिणी । तेषां समष्टिरूपेण पराशक्तिस्तु मातृका ।।’’३ ‘तेषां
    समष्टिरूपेण पराशक्तिं तु मातृकाम् ।’४
    ५. मन्त्र कूटत्रयात्मक है और देवी —त्रयात्मिका है—
    “कूटत्रयात्मिकां देवीं समष्टि व्यष्टिरूपिणीम्’’५
    ६. देवी मूलविद्या है—‘‘तन्मयी मूलविद्या च तदद्य कथयामि ते ।।’’६ सारे

१. स्वच्छन्द संग्रह २-६. योगिनीहृदय ‘दीपिका’