वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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द्वितीयोंऽशः २९३
- सरोजिनी *
'विद्या' की योगिनीरूपता एवं राशिरूपता—"योगिनीहृदय" में विद्या की
योगिनीरूपता एवं राशिरूपता की पुष्टि करते हुए कहा गया है कि—
“विद्यान्तर्भूतशक्त्याद्यैः षड्भिस्तथाक्षरैः । योगिनीत्वं च विद्याया राशित्वं चान्त्य-
वर्जितैः ॥” अमृतानन्द योगी ने इसकी पुष्टि में कहा है कि—१. पंचदशी में १५
अक्षर है । २. तीन हल्लेखायें हैं ३. तीन लकार हैं—अतः विद्या के षडक्षरात्मिका
होने के कारण इसे 'योगिनी' कहा गया है—'विद्यायाः पंचदशाक्षर्या अन्तर्भूताः
शक्तयो हल्लेखास्तिस्रः, तदाद्याश्च लकारास्त्रयः शाक्तैरेतैः षड्भिरक्षरैर्विद्यायाः
योगिनीत्वम् । योगिन्य डाकिन्याद्याः षट् ॥'१ अमृतानन्दजी ने 'षड्भिरक्षरैर्विद्याया'
कहकर 'विद्या' को षडाक्षरी क्यों कहा? विद्या तो पंचदशाक्षरी है फिर षडाक्षरी
कैसे? वस्तुतः इस विद्या में पुनरावृत्ति का त्याग करने पर इसमें मात्र मूलतः ६
अक्षर ही पाये जाते हैं यथा “क ए ई ल ह्रीं । ह स क ह ल ह्रीं । स क ल
ह्रीं”—में ३ कार, ३ लकार, २ हकार, २ सकार एवं ३ ह्रींकार है । इनकी
पुनरावृत्ति—शून्य वर्णसंख्या निम्नानुसार मात्र ६ हैं—“१. क, २. ए, ३. ई, ४.
ल, ५. ह, ६. स”
'विद्यान्तर्भूतशक्त्याद्यैः शाक्तैः षड्भिरथाक्षरैः ।
योगिनीत्वं च विद्याया राशित्वं चान्त्यवर्जितैः ॥'
अमृतानन्द जी कहते हैं कि इस विद्या में १५ अक्षर हैं, अन्त में ३
हल्लेखायें हैं यदि हल्लेखाओं को छोड़ दिया जाय तो विद्या में मात्र १२ अक्षर ही
रह जाएँगे । अतः 'विद्या' राशिरूपिणी भी है—'अस्या विद्यायाः पंचदशाक्षर्या अन्त्या
हल्लेखास्तिस्रः, तद्वर्जितैर्द्वादशभिर्वर्णै राशित्वं भवेदिति । राशियाँ भी १२ हैं—
“राशयो मेषाद्या द्वादश” विद्या में गणेशत्व भी कहा गया है—
‘एकादशाधिकशतदेवतात्मतया पुनः ।
गणेशत्वं महादेव्याः इत्यादिना ॥’३
आचार्य भास्करराय कहते हैं कि—‘विद्यान्तर्भूता शक्तिर्हल्लेखान्त्य ईकारः ।
तस्मादाद्यं रेफान्तं कूटमेकम् । शक्त ईकार एक इति प्रतिकूटं द्वौ द्वाविति षड्भिरक्षरै
र्योगिनीत्वम् । अथवा शक्तेर्हल्लेखाया आद्या लकारास्त्रयः शाक्ताः सकारा स्त्रयः इति
षट् ।। प्रथमपक्षे सम्पूर्णाया विद्यायाः योगिनीत्वं अस्मिन् पक्षे तु एकदेशस्य ॥’४
भास्करराय का कथन है कि यदि प्रत्येक कूट के अन्त में प्रयुक्त ‘ह्रीं’ को हटा
दिया जाय तो १५ के स्थान पर विद्या में मात्र १२ अक्षर रह जायेंगे—इससे भी
द्वादशसंख्यात्मा राशियों की भाँति विद्या भी द्वादशाक्षरी सिद्ध होने से ‘राशि’ सिद्ध
होगी—‘लज्जाबीजानि त्रीणि तैर्वर्जितैः पूर्वाक्षरे मेलनेन गणितैरक्षरैर्द्वादशमी
राशित्वम् ॥’५
१-३. अमृतानन्द—योगिनीहृदय ‘दीपिका’ ४-५. सेतुबन्ध