वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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गणेशत्वम् ॥'१
'मन्त्र' निर्मित होते हैं शब्दों से या वाणियों से । देवी वाक्चतुष्टयात्मिका एवं
मंत्रात्मिका है—'सर्वशक्तिमयी सर्वमङ्गला सद्गतिप्रिया । सर्वेश्वरी सर्वमयी सर्वमन्त्र-
स्वरूपिणी (ललिता सहस्रनाम) 'विद्या' अक्षरस्वरूपा है—'अष्टात्रिंशत्कलायुक्त
पंचाशद्वर्णविग्रहा ।। (यो०ह०) भगवती भी परा-पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरी (वाक्चतुष्टया)
भी है—
'परा प्रत्यक्चितीरूपा पश्यन्ती पर देवता ।
मध्यमा वैखरीरूपा भक्तमानसहंसिका ।। (ल०सह०)
आचार्य भास्कर 'योगिनीहृदय' की अपनी टीका 'सेतुबंध' में कहते हैं कि—
'श्रीविद्या गणेशरूपिणी है'—'गणेशोऽभून्महाविद्या परावागादिवाङ्मयी'२ महाविद्या
गणेशरूपा तो है साथ ही साथ परा, पश्यन्ती, मध्यमा एवं वैखरी रूपा भी है ।३
अमृतानन्दनाथ कहते हैं—'चतुर्विधमातृकामयत्वात् अकथादि वैखर्यादिवर्गगणत्रयबीज-
त्रयावयवत्वाच्च, सेयं महाविद्या गणेशोऽभूदित्यर्थः ।।'४ आचार्य भास्करराय कहते हैं
कि 'अ क थ' का कथन है कि—'अ' = अकारादिषोडशस्वरात्मक तार्तीय
शक्तिकूट ।। 'क' = कादिदान्ताक्षररूप द्वैतीयीक कामराजकूट । 'थ' = थकारादि
सकारान्ताक्षरमयं प्राथमिक वाग्भव । 'विद्या' = गणेश ।। 'विद्या' = शक्ति, कामराज
एवं वाग्भव । 'विद्या' = कूटों के वर्णों एवं परा-पश्यन्ती-मध्यमा एवं वैखरी ।।
बिन्दुत्रयनादत्रयतदन्यकूटत्रयैर्ग्रहत्वमिह ।
नक्षत्रत्वं च दशाकाराणां व्यञ्जनैरपार्थक्यात् ॥ ८९ ॥
(श्रीविद्या की ग्रहरूपत्मकता एवं नक्षत्र रूपात्मकता )
तीन बिन्दु, तीन नाद एवं तीनों कूटों (वाग्भव, कामराज एवं शक्तिकूट) के
अवशिष्टांशों के द्वारा निर्मित होने के कारण (यह विद्या) ग्रहरूपात्मिका भी है ।
(उसी भाँति) व्यंजनों से दश अक्षरों के पृथक् न होने के कारण (सत्ताईस अक्षरों
से युक्त यह श्रीविद्या) नक्षत्ररूपात्मिका भी है ॥ ८९ ॥
- प्रकाश *
बिन्दुनादनिर्मुक्तं कूटमेकं बिन्दुरेको नाद एकः, एवं प्रतिकूटं त्रयं त्रयमित्यर्थः ।
तदुक्तम्—'बीजबिन्दुध्वनीनां च त्रिकूटेषु ग्रहात्मिका' इति । बिन्दवश्च ध्वनयश्चेति
द्वन्द्वोत्तरं बीजानां बिन्दुध्वनय इति तत्पुरुषात् । तेन च बीजबिन्दुध्वनीनामिति पदेन षड्
गणिता भवन्ति । तेषां षण्णां त्रिकूटेषु; अर्थात् तदतिरिक्तेषु त्रिषु मेलनेनेति शेषः ।
षष्ठ्या वा संबन्धित्वमर्थः । तैः षड्भिः संमेल्य गणितेषु कूटेषु सत्सु ग्रहात्मिका विद्या
भवतीति योजना । ये तु बीजपदेन हकाररेफेकारसमूहमात्रम्, तानि च बिन्दवश्च
१. भास्करराय—'सेतुबन्ध' (श्लोक ६३ : 'मन्त्रसंकेत')
२-४. अमृतानन्दनाथ—योगिनीहृदय 'दीपिका' ('मन्त्रसंकेत' ६३-६४)