वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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रखना ही निगर्भार्थ है ।१
४. देवी की परमात्मा के साथ एकरूपता—भगवान् शङ्कराचार्य ने
'सौन्दर्यलहरी' में इस एकात्मता का इस प्रकार उल्लेख किया है—'शिवःशक्त्या
युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं । न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ॥''
'शिवचक्र' एवं 'शक्तिचक्र' दोनों मिलकर ही नवयोन्यात्मक श्रीचक्र का निर्माण
करते हैं—'चतुर्भिः शिवचक्रैश्च शक्ति चक्रैश्च पंचभिः । शिवशक्त्यात्मकं ज्ञेयं श्रीचक्रं
शिवयोर्वपुः ॥'' शिव-शक्ति अभिन्न है क्योंकि—'परोऽपिशक्तिरहितः शक्त्या युक्तो
भवेद्यदि । सृष्टि स्थितिलयान् कर्तुमशक्तः शक्त एव हि ॥''२
अथ विद्यायां गणेशादिरूपत्वमुपपादयति—
अकथादिकषोडशाक्षरात्मकतार्तीयककामवाग्भवैः ।
घटिता च परादिवाग्गणैरिति विद्यापि गणेशरूपिणी ॥ ८८ ॥
(श्रीविद्या की कूटत्रयात्मकता एवं वाक्चतुष्टयात्मकता)
श्रीविद्या गणेशरूपत्मिका भी है (क्योंकि यह श्रीविद्या) अ-क-थ वर्गों से आरंभ
होने शक्तिकूट (अकारादिषोडशक स्वरात्मक) कामराजकूट (कादि तान्ताक्षरस्वरूप)
एवं वाग्भवकूट (थकारादि सकारान्ताक्षरमय) के सोलह अक्षरों एवं परा (पश्यन्ती,
मध्यमा, वैखरी) आदि वाक्चतुष्टय के द्वारा निर्मित है ॥ ८८ ॥
- प्रकाश *
अकारादिषोडशस्वरात्मकं तार्तीयं शक्तिकूटम् । कादितान्ताक्षररूपं द्वैतीयीकं
कामराजकूटम् । थकारादिसकारान्ताक्षरमयं प्राथमिकं वाग्भवकूटम् । परादि-
वाक्चतुष्टयरूपं चैतद्व्यष्टिसमष्टिभेदेन । अतः शब्दगणस्येशत्वाच्छ्रीविद्यापि गणेशरूपा ।
वैतालीयं छन्दः ॥ ८८ ॥ - सरोजिनी *
'विद्या' कुण्डलिनीरूपा है । 'कुण्डलिनी' वाक्चतुष्टयात्मिका है । वाक्चतुष्टय
वर्णमाला, समस्त अक्षर एवं समस्त ध्वनियाँ कुण्डलिनी हैं । इसलिए कुण्डलिनी
वाक्चतुष्टयात्मिका है । विद्या को कुण्डलिनी भी कहा गया है—"विद्या कुण्डलिनी
रूपा मण्डलत्रयभेदिनी ।'' (यो०हृ०) ॥ अर्थात् विद्या कुण्डलिनी होने के 'कारण
वाक्चतुष्टय से समन्वित है ।
अकारादि, ककारादि १६, १६, वर्ण है । उसमें 'तृतीयकूट' अकारादि
स्वरूप एवं हकार व्यञ्जन रूप है । 'द्वितीयकूट' ककारादि रूप एवं लकाररूप
हैं । प्रथमकूट थकारादिरूप एवं षकारादिरूप हैं । इस प्रकार ५० की संख्या होने
के कारण विद्या का गणेशत्व सिद्ध है—'एवमेक पंचाशत् संख्याकत्वाद्विद्याया
१. अमृतानन्दनाथ—योगिनीहृदय 'दीपिका' २. चतुश्शती
१९ वरि.