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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 530 में से

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पृष्ठ 387

द्वितीयोऽंशः २८५

  • सरोजिनी *
    “ग्रहरूपेत्युच्यते माता”—“माता ग्रहरूपा है”—ऐसा कहा जाता है । ग्रह नौ
    है—सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु ।। देवी
    ग्रहरूपात्मिका भी है । देवी इसलिए ग्रहरूपा है क्योंकि उनके भी नौ अङ्ग हैं—
    यथा (क) इच्छा-ज्ञान-क्रिया—३ प्रमुख शक्तियाँ (ख) सतोगुण-रजोगुण एवं
    तमोगुण—३ गुणत्रय; (ग) अग्नि-सोम-सूर्य- ३ = ३ + ३ + ३ = ९ ॥
    ‘योगिनीहृदय’ में भी देवी के इस ग्रहरूपता का प्रतिपादन किया गया है यथा—
    “महादेव्याः ससोमरविविपावकैः । इच्छा ज्ञान क्रियाभिश्च गुणत्रययुतैः पुनः ग्रहरूपा च
    सा देवीः ........।”¹ ‘सङ्केतपद्धति’ में देवी की ग्रहरूपता का वर्णन इस प्रकार प्राप्त
    होता है—‘इच्छाशिरः प्रदेशस्था ज्ञाना च तदधोगता । क्रिया पादगता ह्यस्याः शान्ता
    द्वार्धार्धमध्यगा ।।' देवी, गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी, राशि एवं मंत्र सभी का
    मूर्तिमान्² स्वरूप हैं—
    ‘गणेशग्रहनक्षत्रयोगिनीराशिरूपिणीम् ।
    देवीं मन्त्रमयीं नौमि मातृका पीठरूपिणीम् ॥’³
    इन्द्रियदशकेनान्तःकरणचतुष्केण विषयदशकेन ।
    प्रकृतिपुरुषगुणतत्त्वैर्जाता नक्षत्ररूपिणी माता ॥ ८५ ॥
    (देवी की नक्षत्र-रूपता का प्रतिपादन)
    दश इन्द्रियों, चार अन्तःकरणों, दश विषयों तथा प्रकृति, पुरुष एवं
    गुणतत्त्वों से (संयुक्त होने के कारण)—देवी ग्रहरूपात्मिका है—इस प्रकार कही
    जाती है ॥ ८५ ॥
  • प्रकाश *
    ज्ञानेन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि पञ्च, कर्मेन्द्रियाणि वागादीनि पञ्चेति दशेन्द्रियाणि, मनो
    बुद्धिरहङ्कारश्चित्तं चेत्यन्तःकरणचतुष्कम्, शब्दादयो वचनादयश्च विषया दश । प्रकृति-
    र्गुणत्रयसाम्यावस्था, पुरुषः, सत्त्वादिगुणत्रयसमष्टिरूपं सुखदुःखमोहमूलं गुणतत्त्वम् ।
    एवं सप्तविंशतिसंख्याकत्वान्नक्षत्ररूपत्वं मातुः ॥ ८५ ॥
  • सरोजिनी *
    ‘योगिनीहृदय’ में देवी की नक्षत्ररूपता का प्रतिपादन इन शब्दों में किया गया
    है—“ज्ञानकर्मेन्द्रियैरपि । तदर्थैरिव देवेशि कारणैरन्तरैः पुनः । प्रकृत्या च गुणो नापि
    पुंस्त्वबंधेन चात्मना । नक्षत्रविग्रहा जाता ॥”⁴ “ज्ञानकर्मेन्द्रियैरपि ।।” १० इन्द्रियाँ,
    ४ अन्तःकरण (मन । बुद्धि । चित्त । अहङ्कार) १० विषय, १ प्रकृति, १ पुरुष,
    १. योगिनीहृदय २. संकेतपद्धति
    ३. तन्त्रराजतन्त्र ४. योगिनीहृदय