वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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द्वितीयोऽंशः २८१
शिवशक्त्याद्यया मूलविद्यया परमेश्वरि ।
जगत्कृत्स्नं तया व्याप्तं शृणुष्वावहिता प्रिये ॥
पञ्चभूतमयं विश्वं तन्मयी सा सदानधे ।
तन्मयी मूलविद्या च तदद्य कथयामि ते ॥
हकाराद् व्योम संभूतं ककारन्तु प्रभञ्जनः ।
रेफादग्निः सकाराच्च जलतत्त्वस्य संभवः ॥
लकारात् पृथिवी जाता तस्मात् विश्वमयी चसा ।
गुणाः पञ्चदश प्रोक्ता भूतानां तन्मयी शिवा ॥
यस्य यस्य पदार्थस्य या या शक्तिरुदीरिता ।
सा सा सर्वेश्वरी देवी स स सर्वो महेश्वर ॥
ब्रह्म एवं जगत् में अभेद की दार्शनिक दृष्टि इस प्रकार है—
ॐ ॐ
ॐ
गं
ॐ 15 • च ॐ ॐ
ॐ
अव्यक्त जगत = प्रलय
की अवस्था
ॐ ॐ
ॐ ॐ
परब्रह्म
शब्दब्रह्म
ॐ
↓
जगत
शब्द का व्यक्त जगत
विवर्त
ॐ ॐ