वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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२८० वरिवस्यारहस्ये
'सप्तत्रिंशत्तत्त्वानि'—"स्वर व्यञ्जनभेदेन सप्तत्रिंशत्प्रभेदिनी"
तदेतदभिसंधायाह—
जन्यजनकयोर्भेदाभावाद् वाच्यस्य वाचकेनापि ।
ब्रह्मणि जगतो जगति च विद्याभेदस्तु संप्रदायार्थः ॥ ८१ ॥
(सम्प्रदायार्थ का स्वरूप)
(जिस प्रकार) संसृष्ट एवं सर्जक (कार्य एवं कारण), वाच्य एवं वाचक तथा
ब्रह्म एवं जगत् में भेद का अभाव है (उसी प्रकार) विश्व एवं विद्या में भी
अभेदात्मकता है—यही सम्प्रदायार्थ है ॥ ८१ ॥
- प्रकाश *
ब्रह्मणि जगत् इत्यत्र, अभेद इति शेषः । सम्यग्गुरुशिष्यपारंपर्यक्रमायातमर्यादानु-
सारेण दीयत इति संप्रदायार्थः ॥ ८१ ॥ - सरोजिनी *
'ब्रह्मणि जगतो अभेद'—ब्रह्म एवं जगत् में अभेद हैं आचार्य भास्करराय
कहते हैं—१. कार्य-कारण, संसृष्ट—सर्जक, वाच्य-वाचक में अभेद है—इसी प्रकार
ब्रह्म एवं जगत् में अभेद हैं ।
२. जगत् एवं पञ्चदशीविद्या में भी अभेद है । यही अभेदद्वय की अनुभूति
एवं पुष्टि संप्रदायार्थ का मूल भाव है ।
'सम्प्रदायार्थः'—सम्प्रदायागत अर्थ ॥ 'कुलार्ण तन्त्र' में 'सम्प्रदाय' की
निम्नानुसार व्याख्या की गई है—
'संसारसारभूतत्वात् प्रकाशानन्ददानतः ।
यशः सौभाग्य करणात् सम्प्रदाय इतीरितः ॥''
सम्यक्रूपेण परम्पराक्रमेण गुरुशिष्य-परम्परानुसारण ज्ञानं प्रकर्षेणदीयते अनेन
इति सम्प्रदायः ॥ भगवान् भैरव ने इसी बात को इस प्रकार संपुष्ट किया है—
“कर्णात्कर्णोपदेशेन सम्प्राप्तमवनीतलम् ॥” (योगिनीहृदय) इसी परम्परा द्वारा सम्यक्
रीत्या ज्ञान शिष्यों को प्रदान किया जाता रहा है इसीलिए इसे 'सम्प्रदाय' कहा गया
है । इसीलिए कहा गया है—'गुरु शुश्रूषया विद्या' ॥ अमृतानन्दयोगी ने
'योगिनीहदय दीपिका' में कहा है—
'सम्यक् याथार्थ्येन कर्णे शिष्यस्य प्रदीयते इति सम्प्रदायः ॥' 'योगिनीहृदय' में
इसका स्वरूप इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है—
'सम्प्रदायो महाबोधरूपो गुरुमुखे स्थितः ।
विश्वाकार प्रथायास्तु महत्वञ्च यदाश्रयम् ॥